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Archive for the ‘उपन्यास’ Category

देवयानी

‘‘देवयानी”

हर रोज़ की तरह कमलकांत ड्राइंग-रूम में बैठे, समाचार-पत्र पढ़ रहे थे। किशन चाय की प्याली लाया तो अख़बार से नज़र हटा, चाय की प्याली मुँह से लगा ली। एक घूँट चाय ले, फिर अख़बार पर नज़र डाली तो एक समाचार देख, उनके चेहरे का रंग उड़ गया। ख़बर में प्रसिद्ध समाज-सेवी अमरकांत की आकस्मिक मृत्यु की सूचना छपी थी। अख़बार हाथ से छूट गया। सिर सोफ़े की पीठ से टिका, आँखें मूद लीं। उनकी ये हालत देख, कुर्सियाँ साफ कर रहा किशन, कमलकांत के बड़े बेटे शशिकांत को बुला लाया।

‘‘पापा ……… क्या हुआ ? आप ठीक तो हैं ? किशन, पानी ला।‘‘

शशिकांत के घबराए स्वर से कमलकांत ने आँखें खोलीं। आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली।

 ‘‘पापा, आप कुछ बोलते क्यों नहीं ? ‘‘

‘‘अमर ……. हमारा अमर नहीं रहा, शशि।‘‘ मुश्किल से इतना कह, सामने पडा़ अख़बार शशि को थमा दिया।

सूचना पढ़, शशिकांत स्तब्ध रह गया घर में आग की तरह यह खबर फैल गई। अमर की माँ ढ़ाड़े मारकर रो पड़ी। रोते-रोते- अस्फुट शब्दों में किसी अभागिन कल्याणी को कोसती गईं।

ख़बर दो दिन पहले की थी, यानी अब तक अमर का नश्वर शरीर भी राख हो चुका होगा। किसने उसे मुखाग्नि दी होगी। हाँ, उसकी बेटी…..। शायद देवयानी नाम है, उसका, क्या उसी ने पिता की चिता को अग्नि दी होगी ? उस हाहाकार के बीच घर के बड़े बेटे शशिकांत के मन में एक सवाल उमड़ रहा था। अमर के न रहने पर दोनों मां-बेटी क्या करेंगी ? कहीं वे दोनों इस घर में तो नहीं आ जाएँगी, पर क्या माँ-पापा, उन्हें आश्रय देंगे ? पिछले दस वर्षो से अमर घर से निष्कासित है, इस बीच उसकी चर्चा करना भी निषिद्ध रहा। पुरानी कहानी, शशिकांत को अच्छी तरह याद है……

राय बहादुर कमलकांत को अपने उच्च कुल-गोत्र पर बड़ा अभिमान था। दो सुयोग्य बेटों के पिता के रूप में बिरादरी में उनका बहुत सम्मान था। बड़ा बेटा शशिकांत पी.डब्लू.डी में इंजीनियर था और जब छोटे बेटे अमर ने प्रशासनिक परीक्षा में सफलता पाई तो मानो उनके सपने आकाश छूने लगे। शशिकांत का विवाह एक नामी परिवार की इकलौती बेटी से हो चुका था और आज वो एक पुत्र रोहन और पुत्री रितु का पिता था। कलक्टर दामाद पाने के लिए धनी परिवार वालों की लाइन लग गई थी।

कमलकांत कुछ निश्चय कर पाते कि गाँव से वयोवृद्ध पिता की बीमारी की ख़बर आ गई। कमलकांत असमंजस में पड़ गए। पिता की गांव न छोड़ने की ज़िद से वह परिचित थे। उन्हें शहर ला पाना असंभव था। एक जरूरी काम की वजह से उनका गाँव जाना कठिन था। पिता की परेशानी का समाधान, अमर ने आसानी से कर दिया-

‘‘आप परेशान न हों, पापा। मेरी ट्रेनिंग शुरू होने में अभी एक महीने का वक्त है। मैं बाबा की सेवा के लिए चला जाऊँगा।‘‘

‘‘उन्हें क्या तू सम्हाल पाएगा, अमर?‘ कमलकांत शंकित थे।

‘‘क्यों नहीं, पापा। जब मैं छोटा था, बाबा ने मुझे सम्हाला, अब उन्हें मेरी ज़रूरत है। मैं उन्हें अच्छी तरह सम्हाल लूँगा।‘‘ अमर को अपने पर पूरा विश्वास था।

‘‘हाँ-हाँ, वो तो जानता हूँ, तू अपने बाबा का लाड़ला पोता है। ठीक कहता है, शायद तू ही उन्हें सम्हाल सकता है।‘‘ कमलकांत ने स्नेहपूर्ण स्वर में कहा।

पैतृक गांव में पहुँचे अमर की आंखों के सामने पुरानी मीठी यादों की तस्वीरें उभरती आईं। दादी जब तक जीवित रहीं, वे सब साल में दो बार होली-दीवाली पर गाँव जरूर आते। दादी का प्यार गाँव के जीवन में मिठास भर देता। पेड़ से कच्चे-पक्के आम-अमरूद तोड़ने का मज़ा ही और होता। माँ की मृत्यु के बाद कमलकान्त ने बहुत कोशिश की पिता।कोऽपने साथ शहर ले आएं, पर बाबा तैयार नहीं हुए। उस घर में पत्नी की स्मृतियाँ थीं, कमलकांत के जन्म से जुड़ी यादें थीं। अन्ततः पिता को पुराने सेवक रामदीन के सहारे छोड़, वे सपरिवार शहर आगए। अब कभी-कभी बाबा के पास कमलकांत हो आते। युवा होते पुत्रों के पास पढ़ाई का बोझ बढ़ता गया और गाँव जाने के लिए समय कम पड़ता गया।

अमर को देख, बाबा की आँखों में खुशी की चमक आगई।

‘‘चल, मेरी बीमारी ने मेरे अमर को तो बुला लिया।‘‘

‘‘क्यों बाबा, तुमने ही तो हमे भुला दिया है, वर्ना क्या शहर में हमारे साथ न रहते ?‘‘

तू नहीं समझेगा, रे। इस घर के कोने-कोने में पुरानी यादें हैं। उन्हें बटोर कर शहर कैसे जाऊँ, अमर ?‘‘ बाबा की आवाज़ भीग आई।

रामदीन ने अमर के ठहरने की पूरी व्यवस्था कर रखी थी। बाबा को दलिया और दवा खिलाने के बाद जब अमर बिस्तर पर लेटा तो याद आया, दादी रात में कहानियाँ सुनाया करती थीं। शशि को महाभारत और रामायण की कहानियाँ सुनना पसंद था, पर अमर मचल जाता-

‘‘हमें ये कहानियाँ नहीं सुननी हैं, हमें भगत सिंह की कहानी सुनाओ।‘‘

दादी प्यार से उसका सिर सहला, आशीर्वाद देतीं -

‘‘तू एक दिन ज़रूर भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस की तरह महान इंसान बनेगा।‘‘

अमर के सोच में एक मीठे गीत ने बाधा डाल दी। किसी लड़की की मीठी आवाज़ में गाए गीत ने, उसे सोच में डाल दिया – गाँव में कौन ऐसी सुर-साधना कर सकता है ? सुबह रामदीन से पूछने का निर्णय ले, अमर सो गया।

दूसरी सुबह बाबा कुछ अच्छा महसूस कर रहे थे। बुख़ार के साथ खांसी में भी कुछ कमी आई थी। अमर को रात का गीत याद हो आया। रामदीन से पूछा –

‘‘रामदीन रात में कोई गीत गा रहा था। गाँव में इतना अच्छा संगीत का ज्ञान होना ताज्जुब की बात है।‘‘

‘‘वो हमारे मास्टरजी की बेटी कल्याणी रही, भइया। बड़ी गुणी बिटिया है। बाबा से उसे बहुत प्यार है। तुम नहीं जानते, जब तब आकर बाबा के काम करके हमारी मदद करती है।‘‘ स्नेह से वृद्ध रामदीन का स्वर गदगद था।

‘‘क्या गांव में कोई नए मास्टरजी आए हैं, रामदीन?‘‘

‘‘अरे नहीं, भइया। वही मास्टरज़ी हैं, जो बाबा के कहने पर तुम दोनों भाइयों को पढ़ाने आया करते थे। तुम उनके आने पर छिप जाया करते थे।‘‘ रामदीन के झुर्रीदार चेहरे पर मुस्कान आ गई।

‘‘हां, मुझे पहाड़े याद करना अच्छा नहीं लगता था और मास्टरजी बार-बार पहाड़े रटाते थे। आज मास्टरजी से मिलकर आऊँगा।‘‘

‘‘ठीक है, पहले दूध पीकर नाश्ता कर लो। तुम्हारा मनपसंद हलवा बनाया है।‘‘

नाश्ता करने के बाद अमर गाँव का चक्कर लगाने निकल आया। बाबा आराम कर रहे थे, घर लौटने की जल्दी का सवाल नहीं था। शुरूआती जाड़ों की गुनगुनी धूप से गाँव नहाया हुआ था। मुग्ध हष्टि से गाँव की शोभा निहारता अमर काफ़ी दूर निकल आया। अचानक उसे प्यास महसूस होने लगी। चारों ओर नज़र दौड़ाने पर पानी कहीं नज़र नहीं आया। कहते हैं, कुंआ प्यासे के पास नहीं आता, पर उस दिन वो कहावत झूठी पड़ गई। सामने से दो युवतियाँ मटकों में पानी लिए आती दिखी थीं। सिर और कमर पर मटकों के साथ सहज रूप में चलते रहना, विस्मयकारी था। आगें बढ़ अमर ने अनुरोध कर ही डाला।

‘‘क्या एक प्यासे को आपके मटके में से थोड़ा- सा पानी मिल सकता है ?‘‘

‘‘अरे वाह। दो कोस दूर से ये पानी किसी को मुफ़्त में पिलाने के लिए नहीं लाए हैं। इतनी ही प्यास लगी है तो नाक की सीध में चले जाओ। झरने से प्यास बुझा लेना।‘‘ पहली युवती ने सीधा जवाब दिया।

‘‘छिः, शन्नो। ऐसे नहीं कहते। प्यासे को पानी पिलाना तो पुन्य का काम है।‘‘ दूसरी लड़की ने शांति से कहा।

‘‘ऐ कल्याणी, तू अपना ज्ञान न बघार। पानी मुफ़्त में नहीं मिलता।‘‘ शन्नो नाम की युवती ने शोखी से कहा।

‘‘क्या गाँव में मेहमान से पैसे लेकर पानी पिलाया जाता है?‘‘ अमर ने ताज़्जुब से पूछा।

‘‘नहीं-नहीं, मेहमान तो देवता-समान होते हैं। लीजिए पानी पी लीजिए।‘‘ कल्याणी नाम की युवती ने सिर का घड़ा उतार, कमर के मटके से पानी की धार उंडेली। अमर मीठा पानी पीता ही चला गया।

‘‘हाय राम, ये कैसी प्यास है, जी ? कल्याणी का पूरा मटका ही खाली कर दिया।‘‘ शन्नो ने आँखें नचाईं।

‘‘ओह। आई एम सॉरी। पानी इतना मीठा था और मुझे इतनी प्यास लगी थी, इसलिए पता ही नहीं लगा, आपका पूरा घड़ा खाली हो गया।‘‘ अमर संकुचित था।

‘‘काई बात नहीं, हम फिर पानी ले आँएंगे।‘‘

‘‘नहीं-नहीं, मुझे मटका दीजिए, मैं पानी भर लाऊँगा।‘‘ अमर ने अनुरोध किया।

‘‘ना-ना, कल्याणी। ऐसी ग़लती ना करना वर्ना इनका क्या भरोसा उसी पास वाली गंदी नदी से पानी भर लाएँगें।‘‘ शन्नो ने चेतावनी दी।

‘‘क्यों, क्या गाँव में साफ़ पानी का अकाल पड़ गया है ?‘‘

‘‘कहाँ से आएगा साफ़ पानी ? नदी के पानी में शहर का कचरा बहकर आता है। कुएँ के पानी पर भरोसा रखो तो बीमारी को दावत दो।‘‘ धीमी आवाज़ में कल्याणी ने कहा।

‘‘अच्छा इसीलिए झरने से पानी लाना पड़ता है। साफ़ पानी तो सबसे पहली ज़रूरत है, उसका तो इंतजा़म करना ही होगा।‘‘ अमर सोच में पड़ गया।

‘‘आप क्या इंतज़ाम कर पाएँगे ? चार दिनों को मेहमान बनकर आए हैं, चले जाएँगे। वैसे किसके घर आना हुआ है?‘‘ कल्याणी ने गंभीरता से कहा।

‘‘राधाकांत जी का छोटा पोता अमर हूँ। अच्छा लाओ, अपना घड़ा दे दो, अभी पानी ले आता हूँ।‘‘

‘‘ओह ! आप बाबा के घर आए हैं। हमारी भूल माफ़ करना। हाँ, हम मेहमानों से काम नहीं कराते। शाम को मटके भर लाएँगे। चल, शन्नो।‘‘

अमर के जवाब की प्रतीक्षा किए बिना कल्याणी, शन्नो को साथ ले, चली गई।

दोनों को जाते देखता, अमर सोच में पड़ गया। शन्नो के मुकाबले कल्याणी गंभीर युवती थी। गाँव में वैसी भाषा और शालीनता देख पाना एक अनुभव था। कल्याणी के सौभ्य चेहरे में सादगी का आकर्षण था। अगर वो शहर में होती तो आधुनिक प्रसाधन उसे सुंदरी का खि़ताब ज़रूर दे देते। न जाने किसकी बेटी है, कल्याणी। बातों से लगता है, वह पढ़ी-लिखी है। शायद गाँव की लड़कियों में शिक्षा का उजाला फैल गया है। ये तो शुभ संकेत है। दो-चार लोगों से पता पूछ, अमर मास्टरजी के घर पहुँच गया।

घर के बाहर की दीवारों पर सुंदर मधुबनी शैली में बने चित्रों को देख, अमर विस्मित था। दरवाज़ा खटखटाने पर जिस लड़की ने द्वार खोला, उसे देख, अमर चौंक गया। ये तो पानी मिलाने वाली लड़की कल्याणी थी।

‘‘अरे आप, यहाँ ?‘‘ कल्याणी भी विस्मित थी।

‘‘मास्टरजी हैं ?‘‘

‘‘हाँ, आप बाबूजी से मिलने आए हैं ?

आइए, बाबूजी बैठक में हैं।‘‘ कल्याणी ने अमर को बैठक में आमंत्रित किया।

सादी सी बैठक में स्वच्छता और सुरूचि थी। बेंत की चार कुर्सियाँ और एक दीवान के अलावा बीच में एक मेज़ थी। मेज़ पर एक कलात्मक टोकरी में रखे ताजे़ हरसिंगार के फूल अपनी मीठी खुशबू बिखेर रहे थे। कुर्सी पर बैठे मास्टरजी पुस्तक पढ़ रहे थे। अमर के आने पर उन्होंने दृष्टि उठा देखा, पर पहचान न सके। कल्याणी ने परिचय कराया -

‘‘बाबूजी, ये राधा बाबा के पोते हैं । आपसे मिलने आए हैं।
‘‘अरे, तुम शशि तो नहीं हो सकते, अमर हो न ? क्यों ठीक पहचाना न ? मास्टरजी के चेहरे पर स्नेह भरी मुस्कान आ गई।

‘‘आपसे ग़लती कैसे हो सकती है, मास्टजी ?‘‘ आदर से पाँव छू, अमर ने कहा।

‘‘अरे कल्याणी बेटी, अमर के लिए पानी-शर्बत तो ला। प्यास लगी होगी।‘‘

‘‘नहीं-नहीं, उसकी ज़रूरत नहीं, एक मटका पानी पीकर आया हूँ।‘‘ अमर ने शरारती नज़र पास खड़ी कल्याणी पर डाली।

‘‘इस बार बहुत दिनों बाद आए हो। क्या काम कर रहे हो ?‘‘

‘‘जी, मास्टरजी। पहले तो पढ़ाई का बोझ था, फिर कम्पटीशन की तैयारी की वजह से एकाध दिन के लिए ही गाँव आ सका। आपके आशीर्वाद से इस बार प्रशासनिक सेवा में चुन लिया गया हूँ।‘‘

‘‘वाह ! ये तो बड़ी खुशी की बात है। ये ख़बर तो पूरे गाँव के लिए गौरव की बात है। सुना कल्याणी, हमारा अमर कलक्टर बन गया है।‘‘ मास्टरजी सच्चे दिल से खुश थे।

‘‘कल्याणी की पढ़ाई का क्या हाल है ? गांव में तो लड़कियों की पढ़ाई का ठीक इंतज़ाम नहीं था।‘‘

‘‘आज भी वही हाल है, अमर। न जाने कितनी अर्ज़ियां दीं । शहर जाकर खुद मिला। बार-बार कहा लड़कियों के लिए बारहवीं तक की पढ़ाई की व्ययस्था कर दी जाए, पर नक्कारखाने में तूती की आवाज़ कौन सुनता है ? कल्याणी ने मेट्रिक पास कर लिया है, अब घर पर ही बारहवीं की तैयारी कर रही है।‘‘ मास्टरजी की आवाज़ में गर्व का पुट था।

‘‘वाह ! ये तो बड़ी अच्छी बात है। आप जैसे पिता के साथ कल्याणी बारहवीं ही क्यों बी.ए, एम.ए तक कर लेगी।‘‘ अमर की बात में सच्चाई थी।

‘‘नहीं, बेटा। मेरा भी यही सपना था, पर शायद ये सपना सच न हो सके।‘‘ मास्टरजी ने लंबी साँस ली।

‘‘ऐसा क्या कह रहे हैं, मास्टरजी ?‘‘

‘‘वो इसलिए कि तुम्हारे मास्टरजी कल्याणी की उच्च शिक्षा में मदद नहीं कर सकते। हालात की मज़बूरियों की वजह से मेट्रिक के बाद बेसिक टीचर की ट्रेनिंग लेकर, नौकरी करनी पड़ी। कल्याणी को बारहवीं की पढ़ाई में मैं मदद नहीं कर सकता।‘‘ मास्टरजी उदास हो गए।

‘‘निराश न हों, मास्टरजी। अपका सपना ज़रूर सच होगा। मैं यहाँ एक महीने तक रूक सकता हूँ। इस बीच कल्याणी की कठिनाइयों को दूर करने में मदद दे सकता हूँ।‘‘

‘‘तूम्हारा बड़ा उपकार होगा, बेटा।‘‘

‘‘ऐसा न कहें, मास्टरजी। आप मेरे गुरू रहे हैं। गुरू का ऋण तो शिष्य कभी नहीं उतार सकता, पर अगर आपके लिए कुछ कर सका तो मेरा सौभाग्य होगा।‘‘

‘‘आजकल तुम जैसे विचारों वाले लड़के कहाँ मिलते हैं, अमर ? जब समय मिले, कल्याणी की मदद कर देना। बेचारी अपने आप पढ़ने की हिम्मत कर रही है।‘‘ मास्टरजी ने कल्याणी पर प्यार भरी नज़र डाली।

‘‘तुम्हारी किस विषय में रूचि है, कल्याणी ?‘‘

‘‘जी, मुझे समाज शास्त्र बहुत अच्छा लगता है।‘‘ शर्माती कल्याणी ने जवाब दिया।

‘‘तुम्हारी संगीत में भी तो रूचि है, कल्याणी।‘‘ अमर को कल्याणी का रात वाला गीत याद हो आया।

‘‘संगीत को विषय की तरह नहीं, शौक की तरह लेती हूँ। आपने कैसे जाना, मुझे संगीत प्रिय है ?‘‘ कल्याणी की बड़ी-बड़ी आँखों में विस्मय था।

‘‘कल रात तुम्हारा गीत सुन पाने का सौभाग्य मिल सका था, कल्याणी।‘‘

‘‘ओह, रात मेरी सहेली तारा की सगाई थी। सबकी ज़िद पर गाना पड़ा।‘‘ कल्याणी के चेहरे पर लाज थी।

‘‘हमारी बेटी अच्छी कलाकार भी है, अमर। घर के बाहर इसी ने चित्रकारी की है। बड़े अच्छे चित्र बनाती है, कल्याणी। बेटी, अमर को अपने बनाए चित्र तो दिखाना।‘‘

‘‘आप तो बेकार ही अपनी बेटी की बड़ाई करते हैं, बाबूजी। हमारे घरेलू चित्र क्या तारीफ़ लायक हैं ?‘‘ कल्याणी संकोच से भर गई।

‘‘तुम खुद ही देखकर तय करना, अमर। कल्याणी के चित्र तारीफ़ लायक हैं या नहीं।‘‘

अपनें चित्र दिखाती उन्नीस वर्षीया कल्याणी, अल्हड़ बालिका बन गई। उत्साह से दिखाए गए चित्रों में राम-कथा के अंश चित्रित थे।

‘‘वाह ! तुम तो बहुत अच्छी कलाकार हो। जानती हो आजकल विदेशों तक में ऐसे पारम्परिक चित्रों की माँग है।‘‘

‘‘सच ?‘‘ कल्याणी विस्मित थी। दूसरे दिन से अमर, कल्याणी को पढ़ाने मास्टरजी के घर जाने लगा। कल्याणी की मेधा और पढ़ाई में उसकी रूचि, अमर को विस्मित करती। काश् इस लड़की को शहर में अपनी प्रतिभा विकसित करने का मौका मिल पाता।

गाँव में रहते अमर को वहाँ की समस्याएँ अनायास ही परेशान करने लगीं। ग़रीबी, गंदगी, अशिक्षा, चिकित्सकीय सुविधाओं का अभाव जैसी समस्याएँ मुँह बाए खड़ी थीं। ग्राम-प्रधान या बी.डी.ओ. से बात करने का ख़ास नतीजा़ न निकलता देख, अमर ने जिला कलक्टर से मिलकर गाँव की समस्याएं समझाईं। अमर की पोजीशन जान, कलक्टर ने समस्याओं के समाधान संबंधी शीघ्र कार्रवाई के निर्देश दिए।

अचानक एक रात सोए बाबा, सुबह न उठ सके। शहर से पूरा परिवार आ गया। बाबा की अर्थी के साथ पूरा गाँव था। तीसरे दिन शुद्धि-हवन के बाद जब कमलकांत का परिवार शहर वापसी की तैयारियाँ कर रहा था। तो मास्टरजी ने अमर से कहा-

‘‘अगर तुम चले गए तो गाँव सुधार के लिए जो काम हो रहे हैं, वो सब अधूरे रह जाएँगे। क्या कुछ दिन और नहीं रूक सकते ?‘‘

ग़ौर करने पर मास्टरजी की बात की सच्चाई स्पष्ट थी। क्या भोले गाँव वालों की ज़रूरतें पूरी कराना, अमर का फर्ज़ नहीं था ? ये सच था जो भी काम शुरू हो रहे थे, उनके पीछे अमर था। माता-पिता के विरोध के बावजूद अमर ने गाँव में रूकने का निर्णय ले लिया। कमलकांत ने सोचा ट्रेनिंग पर जाते वक्त अमर खुद ही घर वापस आ जाएगा। कुछ दिन उसे अपने मन की कर लेने दो, पर कमलकांत का सोचा कहाँ हो सका ?

गाँव के मोह ने अमर को इस तरह से बाँध लिया कि उतनी बड़ी नौकरी छोड़ते उसे ज़रा-सी तकलीफ़ नहीं हुई। प्रशासनिक सेवा का चांस छोड़ने की बात ने पूरे परिवार को चौंका दिया। पिता के सपने टूट गए। सबका समझाना बेकार गया। अमर ने गाँव में रहकर ।ग्रामोद्धार का संकल्प ले डाला।

‘‘स्कूल की मास्टरी ही करनी थी तो इतनी पढ़ाई करने की क्या ज़रूरत थी। ‘‘पिता दहाड़े।

‘‘पढ़ाई से ही तो अच्छे-बुरे का ज्ञान होता है, पापा। स्कूल की मास्टरी करके न जाने कितने बच्चों का भविष्य सँवार सकूँगा। ‘‘शांत पर दृढ़ स्वर में अपनी बात कहकर अमर ने सबको चुप करा दिया।

अमर के गाँव में रहने की ज़िद परिवार वालों ने दिल पर पत्थर रखकर मान ली, पर उसने तो गज़ब ही कर डाला। छोटी-सी बीमारी से मास्टरजी की मौत के बाद कल्याणी के साथ विवाह करने की बात से उसने पिता को ज़बरदस्त धक्का पहुँचा दिया।

‘‘नहीं, कभी नहीं। उस मामूली मास्टर की बेटी हमारे घर की बहू नहीं बन सकती। अपने खांदान का नाम मिट्टी में मिलाकर ही दम लोगे ?‘‘ पिता दहाड़े।

‘‘हाँ, उस मनहूस लड़की के लिए हमारे घर में जगह नहीं है। माँ-बाप नहीं रहे और खांदान में भी  उसका कोई नहीं है।‘‘ माँ ने विरोध किया।

‘‘कल्याणी मनहूस नहीं, गुणवान लड़की है। उसमें इस घर की बहू बनने लायक सभी गुण हैं।‘‘ अमर ने समझाना चाहा।

‘‘चुप रह। बंद कर अपना कल्याणी-पुराण। मेरे जीते जी वो हमारी बहू नहीं बन सकती।‘

‘‘मैं वचनबद्ध हूँ। मास्टरजी के अंतिम समय में मैने बेसहारा कल्याणी का दायित्व लेने का वचन दिया है।‘‘

‘‘ये क्यों नहीं कहता, मास्टर की उस चालाक छोकरी ने तुझे अपने जाल में फँसा लिया है, इसीलिए कलक्टरी छोड़, गाँव में बस गया।‘‘ कमलकांत की आवाज़ में घृणा थी।

‘‘कल्याणी के लिए ऐसे अपमान जनक शब्द मुझे सहन नहीं होंगे, पापा। मै उससे प्यार करता हूँ। सच्चाई ये है, कल्याणी इस विवाह के लिए तैयार नहीं है, पर ये मेरा अपना निर्णय है।‘‘

‘‘वाह ! ये तो नई बात है, उस लड़की की औक़ात ही क्या है जो हमारे बेटे से शादी के लिए तैयार न हो।‘‘ व्यंग्य से कमलकांत के ओंठ फैल गए।

‘‘वो एक स्वाभिमानी लड़की है, पापा। उसका डर ठीक था, मेरे परिवार वाले उसे अपने घर की बहू बनाने को तैयार नहीं होंगे।‘‘

‘‘अगर उसे इतनी समझ है तो क्या तेरी अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं। बहुत हो गया अब गाँव छोड़, वापस आ जा।‘‘

‘‘अब गाँव ही मेरा कर्म- क्षेत्र है और कल्याणी मेरी जीवन-संगिनी बनेगी, ये मेरा दृढ़ निश्चय है।‘‘

‘‘अगर तेरी यही ज़िद है तो याद रख, अगर तूने उस लड़की से शादी की तो तेरे साथ हमारा रिश्ता हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगा।‘‘

‘‘ठीक है, पापा। आपको कल्याणी के साथ ही मुझे स्वीकार करना होगा। अगर आपको मेरी शर्त मंजूर नहीं, तो मै हमेशा के लिए जारहा हूँ।

माँ के रोने और विनती के बावजूद अमर रूका नहीं था। तब से आज तक उस बात को बारह बरस बीत गए। अमर को पुरखों की हवेली में रहने न देने की ज़िद में, कमलकांत ने पुरखों की गाँव वाली हवेली भी बेच डाली। अमर को रहने के लिए मास्टरजी का दो कमरो वाला घर ही काफ़ी था। कमलकांत को विश्वास था, गाँव की तकलीफ़ों से घबराकर, अमर वापस आ जाएगा, पर अमर ने कभी भी पलट कर गाँव का रूख नहीं किया। दूसरों के मुँह से वे सुनते रहे, पूर्वजों के गाँव के कायाकल्प के लिए अमर कृत-संकल्प है। अशिक्षा, स्वास्थ्य, पानी और गंदगी जैसी समस्याओं को दूर करने के साथ गाँव वालों की गरीबी दूर करने के लिए सरकारी योजनाएँ लागू करा रहा है। गाँव वालों के बीच उसे देवता का दर्ज़ा मिला हुआ है। बेटे की तारीफ़े सुन कमलकांत और उनकी पत्नी अमर को देखने को बेचैन हो उठते, पर कल्याणी के कारण वे उसके पास न जा सके। अमर के घर आने का सवाल ही नहीं उठता था। उसने तो साफ़ कह दिया था, कल्याणी के बिना वह घर में कदम नहीं रखेगा। अमर के घर बेटी का जन्म हुआ, इसकी ख़बर भी गाँव के चौधरी से ही मिली थी। चौधरी, अमर को आशीषते न थकते। कमलकांत जी बहुत भाग्यवान हैं, जो उन्हें अमर जैसा बेटा मिला है।

पुत्र की मृत्यु का शोक मनाते एक सप्ताह भी नहीं बीता था कि गाँव के चौधरी के साथ कल्याणी और उनके अमर की बेटी देवयानी, उनके घर आ पहुँची। देवयानी के उदास निष्प्रभ चेहरे पर बुद्धि प्रदीप्त आँखें अनायास ही अमर की याद दिला गईं। विषाद की प्रतिभा सरीखी कल्याणी ने आंसू भरी आँखों के साथ सास-श्वसुर के पाँव छूने चाहे तो दोनों ने पाँव पीछे खींच, अस्फुट शब्दों में न जाने क्या कहा। चौधरी ने स्थिति स्पष्ट कर दी -

‘‘अमर बाबू तो देवता थे। उन्होंने तो गाँव की काया ही पलट दी। ये तो गाँव वालों का ही दुर्भाग्य था, अमर बाबू छोड़कर चले गए। न जाने कैसा जानलेवा बुखार चढ़ा, हज़ार जतन के बाद भी पारा नीचे ही नहीं उतरा।‘‘

‘‘डॉक्टर कुछ नहीं कर सका ?‘‘ भर्राए गले से कमलकांत इतना ही पूछ सके।

‘‘अब क्या कहें, हमारी किस्मत ही खराब थी। डाक्टर बाबू, किसी शादी में कहीं दूर के शहर गए हुए थे। कम्पांउडर से जो बन पड़ा, किया। शहर लाने का वक्त अमर बाबू ने दिया ही कहां ? सोचा गया बुख़ार है, चला जाएगा।‘‘ चौधरी ने लंबी साँस ली।

‘‘ये सब इसी की वजह से हुआ है। मेरा बेटा बेइलाज चला गया।‘‘ कल्याणी पर जलती दृष्टि डाल
अमर की माँ रो पड़ी।

‘‘ऐसी बात नहीं है, माँजी। कल्याणी बिटिया ने तो उस दिन से दाना-पानी ही छोड़ दिया है। होनी को कौन टाल सकता है। अमर बाबू गाँव के अस्पताल को बढ़ाना चाह रहे थे। शहर से दो नए डाक्टर आने वाले थे, पर होनी को कुछ और ही मंज़ूर था।‘‘ चौधरी ने अँगोछे से आँसू पोंछ डाले।

‘‘हम यहां नहीं रहेंगे, हम अपने घर जाएँगे, माँ।‘‘ देवयानी ने बात कहकर दृढ़ता से ओंठ भींच लिए, ठीक वैसे ही जैसे अपनी तकलीफ़ छिपाने को अमर ओंठ भींचकर दर्द सह जाता था।

‘‘नहीं, देवयानी बिटिया। अब यही तुम्हारा घर है। ये तुम्हारे बाबा-दादी हैं।’’ चौधरी ने देवयानी को समझाना चाहा।

‘‘नहीं, हमारा इन दोनों से कोई रिश्ता नहीं हैं, इन्हें तुम वापस ले जाओ, चौधरी।’’ रूखी आवाज़ में कमलकांत ने कहा।

‘‘साहब जी, इस बिटिया की क्या ग़लती है। ये तो आप के बेटे की अखिरी निशानी है। क्या इसमें आपको अपने बेटे की झलक नहीं मिलती ?’’ कमलकांत की दृष्टि देवयानी पर पड़ी तो वे चौंक उठे। बिल्कुल अमर जैसा सौम्य-तेजस्वी चेहरा, वैसे ही आँखों में कुछ कर गुजरने की आग जैसे धधक रही थी। निःशब्द कल्याणी ने कमलकांत के हाथ में एक चिट्ठी पकड़ा दी।

चिट्ठी अमर की थी। पिता के सामने कभी न झुकने के उसके निर्णय को, बेसहारा युवा पत्नी और मासूम बेटी के भविष्य ने झुकने को विवश कर दिया। पत्र में चंद पंक्तियाँ थीं-

पूज्य पापा,

पिछले कुछ दिनों से तबियत ठीक नहीं चल रही है। न जाने क्यों ऐसा आभास-सा हो रहा है, मानों मेरा अंत निकट है। ये पत्र कल्याणी के पास आपके नाम छोड़ रहा हूँ। अगर कभी मैं न रहूँ तो इसे आप तक पहुँचाना उसका दायित्व है।

एक अनुरोध है, अपने इस नालायक बेटे की ग़लती की सज़ा कल्याणी और देवयानी को मत दीजिएगा। मेरे अपराध में इनकी कोइ भागीदारी नहीं है। अगर मैं न रहा तो इन दोनों को अपनी शरण में ले लीजिएगा। इन्हें अकेले छोड़ना सुरक्षित नहीं होगा।

आपके प्रति अपने कर्तव्य नहीं निभा सका, इसका दुख है। बहुत सी ग़लतियों के लिए आपसे क्षमा मिली है। इस बार भी माफ़ करेगें न ?

आपका लाड़ला बेटा,

अमर……….

चिट्ठी के एक-एक शब्द में मानों अमर साकार था। दिवंगत बेटे की अंतिम इच्छा का तिरस्कार कर पाना संभव नहीं था। कल्याणी और देवयानी को घर में जगह ज़रूर दे दी गई, पर उनके प्रति दुर्भाव में कमी नहीं आई। जब-तब बेटे की मौत के लिए कल्याणी को जिम्मेदार ठहरा, सास ताने देकर भड़ास निकालती रहती। जेठ और जिठानी की आंखों में तो खटकती ही, उन्हें डर जो था कहीं पिता की जायदाद में से देवयानी को भी हिस्सा न मिल जाए।

हवेली जैसे घर में एक छोटा-सा कोठरीनुमा कमरा देख, देवयानी को अपने पिता का खुला छोटा सा प्यारा  घर याद हो आया।

‘‘माँ, बाबा का घर इतना बड़ा है, पर हमें ये छोटा-सा कमरा क्यों दिया गया हैं इसकी खिड़की इतनी छोटी है कि हवा भी नहीं आयेगी।’’

‘‘ऐसे नहीं कहते, देवयानी। अब हमारा यही घर है। हम दोनों के लिए इतनी जगह काफ़ी है, बेटी।’’ माँ की आँसू भरी आँखें देखकर, देवयानी जैसे सब समझ गई।

‘‘हाँ, माँ। हमारे लिए ज्यादा जगह क्यों चाहिए। हम दो ही तो हैं। पापा तो चले गए।’’ कल्याणी बेटी को सीने से चिपटा रो पड़ी।

कल्याणी की आँखों से झरते आँसुओं को अपनी हथेली से पोंछती देवयानी ने माँ को बच्चों-सा दिलासा दिया।

‘‘पापा कहते थे, रोना अच्छी बात नहीं है, माँ, बड़े होकर हम तुम्हारे लिए खूब बड़ा सा घर बनवाएंगे।’’

आदत के अनुसार पहली सुबह देवयानी पाँच बजे सवेरे उठ गई। गाँव में रोज़ अमर के साथ ताज़ी हवा में घूमने के बाद झरने के ठंडे पानी से हाथ-मुँह धो, उगते सूर्य को प्रणाम कर घर लौटती थी। कल्याणी उनके लिए गर्म दूध का ग्लास तैयार रखती। इस नए घर में सुबह छह बजे तक सन्नाटा था।

सात बजते-बजते रोहन और रितु को स्कूल भेजने की तैयारी का शोर शुरू हो गया। कल्याणी कमरे में पूजा कर रही थी। आवाज़ें सुन, प्रसन्न मुख देवयानी बाहर आ गई। रोहन और रितु स्कूल यूनीफ़ॉर्म पहने तैयार थे। मेज़ पर दोनों के लिए दूध के ग्लास रखे हुए थे। दादी दोनों से दूध पीने के लिए मनुहार कर रही थीं। रितु ने मुँह बनाकर दूध के प्रति वितृष्णा जताई तो देवयानी ताज़्जुब में पड़ गई। चट मेज़ से दूध-भरा ग्लास उठा, एक सांस में दूध खत्म कर, विजयी निगाह से रितु को देखा था।

‘‘देखा रितु दीदी, हम कितनी जल्दी दूध पी लेते हैं।’’ चेहरे पर हँसी आ भी न पाई थी कि रागिनी-ताई का ज़ोरदार थप्पड़, देवयानी के गाल पर आ पड़ा था।

‘‘भुक्कड़, लड़की, रितु का दूध पी गई। दूसरे के हिस्से की चोरी करते शरम नहीं आती।’’

‘‘हमने चोरी नहीं की, रितु दीदी को दिखाना चाहते थे, हम कितनी जल्दी दूध पी सकते हैं।’’ रोती देवयानी के गाल पर उँगलियाँ उभर आई थीं।’’ दादी ने वहीं से दासी को आवाज़ दी थी-

‘‘कमली इस भुक्कड़ लड़की को चाय दे- दे। देख, रात की रोटी पड़ी हो तो वो भी दे दे। न जाने कहाँ की पेटू आई है।’’

‘‘नहीं, हम बासी रोटी नहीं खाते।’’ सुबकती देवयानी इतना ही कह सकी।

‘‘ओह् हो, तो क्या महारानी जी गाँव में मोहन भोग खाती थीं। सुना अम्माजी ये गाँव की छोकरी कैसी बातें बनाती है।’’ रागिनी के चेहरे पर आक्रोश झलक आया था।

अपमान से देवयानी की आँखें जल उठीं। उसके पापा कहते थे बच्चों को चाय नहीं पीनी चाहिए, पर उस दिन के बाद से देवयानी को जो मिल जाता गले से नीचे उतार लेती।

दो-चार दिनों में ही कल्याणी अपनी स्थिति समझ गई। घर में उसकी स्थिति पुत्रवधू की नहीं, दास-दासी से भी बदतर थी। कम से कम उनसे नफ़रत तो नहीं की जाती। देवयानी को ये समझ पाना मुश्किल लगता घर के दूसरे लोग और उसके समवयस्क उससे बात क्यों नहीं करते। रोहन और रितु के पास जाने पर वे उसे हिकारत की निगाह से देख, मुँह मोड़ लेते।

देवयानी गाँव के स्कूल की सबसे मेधावी छात्रा थी। उसे पिता की बुद्धि और माँ का सौम्य सौंदर्य मिला था। न जाने क्यों उसे स्कूल भेजने की बात कोई नहीं सोचता। रितु और रोहन को ललक से स्कूल जाते देखती। कभी-कभी रितु या रोहन उससे अपना बैग कार तक पहुंचाने को कहते तो देवयानी खिल जाती। बैग उठाए देवयानी मानो खुद को स्कूल जाता महसूस करती।

बार-बार अपनी पुरानी किताबों के पृष्ठ पलटती देवयानी थक चुकी थी।

‘‘माँ, हम भी रितु दीदी के साथ स्कूल जाएँगे। हमे घर में अच्छा नहीं लगता।’’

‘‘अच्छा, बेटी। तेरे बाबा से बात करूँगी।’’ सच्चाई ये थी श्वसुर से कुछ माँगने का कल्याणी में साहस नहीं था। वह तो उनकी निगाह में अपराधिन थी, जिसने उनके बेटे को उनसे छीना था।

एक दिन रितु की किताब पढ़ती देवयानी ऐसी अभिभूत थी कि रितु का आना उसे पता ही नहीं चला। अपनी किताब देवयानी के हाथ में देख, रितु का पारा चढ़ गया। गुस्से में किताब छीनने के प्रयास में किताब का एक पृष्ठ फट गया। अब तो रितु ने घर सिर पर उठा लिया।

‘‘मम्मी, इस लड़की ने मेरी किताब फाड़ दी, इसे घर से निकाल दो।’’

बेटी को रोता देखा, बिना कुछ पूछे रागिनी ने देवयानी को धुन डाला।

‘‘जिसका खाएगी, उसी को परेशान करेगी। ख़बरदार जो कभी आगे से रितु या रोहन के कमरे में पैर भी धरा। बहुत मारूँगी, जो फिर रितु की किताब चोरी से पढ़ी।’’

देवयानी स्तब्ध रह गई। शरीर की चोट से ज़्यादा उसके मन पर जो चोट लगी, उसे माँ से छिपाए रखने की समझ उसमें आ गई थी। दुखी माँ को और दुख पहुँचाने से क्या फायदा ? जिस दिन देवयानी को रितु की पुरानी फ़्राकें पहनने को दी गई, वह विद्रोह कर वैसी

‘‘हम पुरानी फ़्राकें नहीं पहनेंगे। हमे भी  नई फ़्राक चाहिए।’’

‘‘ऐसा नहीं कहते बेटी। बड़ी बहन की फ़्राक पहनने से कोई छोटा थोड़ी हो जाता है।’’

माँ के कहने पर देवयानी ने वो ढीली-ढाली, लंबी फ़्राक पहन ली, पर उसे देख, रोहन का हंसते-हँसते बुरा हाल हो गया।

‘‘ऐ रितु, देख, हमारे घर एक बंदरिया आई है। नाच बंदरिया, नाच।’’

दोनों भाई-बहनों की हंसी ने देवयानी को रूला दिया। उसके बाद देवयानी ने रितु की फ़्राक कभी नहीं पहनी।

उस दिन रितु अपने खाने का डिब्बा स्कूल ले जाना भूल गई। रागिनी परेशान थी, कैसे रितु के पास डिब्बा पहुँचाए। अचानक सामने खड़ी देवयानी को देख, उसे समस्या का समाधान मिल गया। देवयानी के हाथ खाने का डिब्बा थमा, निर्देश दिए थे-

‘‘देख, ये डिब्बा रितु के हाथ में ही देना। वो पाँचवी क्लास में हैं और हाँ भूलकर भी ये मत कहना तेरा रितु से कोई नाता है। पूछने पर कह देना तू गाँव से आई है। समझ गई न ?।

हामी में सिर हिला, देवयानी, रितु के स्कूल उड़कर पहुंच जाना चाहती थी।

रितु का स्कूल देख, देवयानी विस्मित रह गई। ये तो एक नई दुनिया थी। इतना बड़ा स्कूल, इतने बड़े खेल के मैदान और इतने ढेर सारे हँसते-खिलखिलाते बच्चे। काश् देवयानी भी उनमें से एक होती।

पाँचवी कक्षा के बाहर खड़ी देवयानी कक्षा में पढ़ाए जाने वाले पाठ को सुनती अपना स्कूल जाने का मकसद भूल गई। टीचर ने एक सवाल पूछा, क्लास के बच्चों में से किसी का हाथ जवाब देने के लिए नहीं उठा। बाहर खड़ी देवयानी से नहीं रहा गया, मीठी आवाज़ में पूछा-

‘‘टीचर जी, हम इसका जवाब बता सकते हैं। बताएं-

‘‘हाँ-हाँ, जरूर बताओ, पर तुम कौन हो, यहाँ बाहर खड़ी हो ? टीचर ने ताज़्जुब से देवयानी को देखा।

सवाल का ठीक जवाब देकर देवयानी ने बताया, वह रितु का डिब्बा पहुँचाने आई है।

‘‘तुम कहाँ पढ़ती हो, देवयानी ?’’

‘‘हम गाँव में पढ़ते थे। शहर आकर हम स्कूल नहीं जाते। माँ कहती है, जिसके पापा नहीं होते, वो पढ़ने नहीं जाते।’’

देवयानी का उदास मुँह देखकर टीचर का मन भर आया। देवयानी के सिर पर प्यार से हाथ धर कर कहा-

‘‘ये सच नहीं है, देवयानी। तुम एक बुद्धिमान लड़की हो। तुम्हें खूब पढ़ना चाहिए। भगवान तुम्हारी मदद ज़रूर करेंगे।’’

उत्साह से उमगती देवयानी ने टीचर की बात बताकर माँ से कहा, वो ज़रूर पढे़गी, भगवान जी जरूर उसकी मदद करेंगे। कल्याणी की आँखें छलछला आईं, आज अगर अमर होते तो क्या उनकी दुलारी बिटियां की ये स्थिति होती। अमर तो कल्याणी को भी बी.ए. की परीक्षा दिलाने को तैयार कर रहे थे, पर बेटी के जन्म के बाद कल्याणी का स्वास्थ्य खराब हो गया और पढ़ाई पूरी न हो सकी। अमर का कहना था, औरत को इस लायक बनना चाहिए कि ज़रूरत के वक्त किसी पर आश्रित न रहे। काश कल्याणी बी.ए. करके, अपने पाँवों पर खड़ी हो पाती। अचानक कल्याणी जैसे चैतन्य हो आई। जो उसके साथ हुआ, उसकी बेटी के साथ नहीं होना चाहिए।

कल्याणी को अपने सामने देख कमलकांत चौंक गए। धीमी आवाज़ में कल्याणी ने विनती की-

‘‘ एक विनती है, पापा जी ?’’

‘‘क्या कहना चाहती हो ?’’ रूखे स्वर में कमलकांत ने पूछा।

वो देवयानी को खूब पढ़ाना चाहते थे। कहते थे उसे डाक्टर बनाएँगे। उनकी ये इच्छा आप ही पूरी कर सकते हैं, पापा जी।’’ कल्याणी का स्वर निरीह हो आया।

‘‘मैं क्या कर सकता हूँ ? आवाज़ में फिर वही रूखापन था।

’’देवयानी को स्कूल में दाखिल करा दीजिए। मैं घर का सारा काम करूँगी, जो कहेंगे, वैसा करूँगी। देवयानी का भविष्य बना दीजिए।’’ कल्याणी की आँखें भर आईं।

दूसरे दिन खाने की मेज़ पर कलमलकांत ने शशिकांत से कहा-

‘‘मेरे ख्याल में देवयानी को स्कूल भेजा जाना चाहिए। शशि तुम रितु के सकूल में देवयानी का भी नाम लिखा दो।’’

‘‘क्या-आ ? आप क्या कह रहे हैं, पापा ? रितु के स्कूल की फ़ीस कितरी भारी है, क्या आप जानते हैं ?’’

‘‘वाह! पापाजी, गाँव की लड़की को आप उतने बड़े अंग्रेजी स्कूल में भेजना चाहते हैं। वो भला वहाँ की लड़कियों के सामने सिर उठाकर बात कर पाएगी ? अगर पैसा फ़ालतू है तो कहीं दान कर दीजिए। रागिनी की आवाज़ का रोष छिपा नहीं था।

‘‘अरे इनकी तो उमर के साथ बुद्धि ही ख़त्म होती जा रही है। उस दिहातिन लड़की को मेम साहब बनाना चाहते हैं।’’ कमलकांत की पत्नी ने भी बेटे-बहू का साथ दिया।

‘‘अगर रितु के स्कूल में नहीं पढ़ सकती तो किसी दूसरे स्कूल में तो नाम लिखाया जा सकता है। आख़िर लड़की को अनपढ़ तो नहीं रखा जा सकता है।’’

‘‘ठीक है, पास ही में सरकारी स्कूल है। ड्राइवर से कह दूँगा, उसका नाम उसी स्कूल में लिखा दे।’’

पहले दिन स्कूल जाती देवयानी का चेहरा खुशी से चमक रहा था। स्कूल घर के पास ही था, इसलिए पैदल जाना आसान था। घर के दास-दासियों के पास देवयानी को पहुँचाने-लाने के लिए व्यर्थ का समय कहाँ था ? कल्याणी ने खुशी-खुशी ये दायित्व ले लिया। रागिनी ने ताना देकर कहा-

‘‘हां-हां, इसी बहाने कल्याणी बाहर की सैर कर आया करेगी।’’

स्कूल की बातें देवयानी पूरे उत्साह से सुनाती। उसकी टीचर महिमा दीदी बहुत अच्छी हैं। वो देवयानी को बहुत प्यार करती हैं। पहली ही परीक्षा में हर विषय में पूरे अंक लाकर देवयानी ने महिमा जी को विस्मित कर दिया।

‘‘तुम्हें घर में कौन पढ़ाता है, देवयानी ?’’

‘‘अब तो कोई नहीं पढ़ाता। जब तक पापा थे, वे मुझे ही नहीं, पूरे गाँव के बच्चों को पढ़ाया करते थे, दीदी।’’ गर्व से देवयानी ने बताया।

‘‘तुम्हारी माँ तुम्हें नहीं पढ़ाती, देवयानी ?’’

‘‘मां को घर के बहुत सारे काम करने पड़ते हैं, दीदी। उन्हें पढ़ाने का वक्त कहाँ से मिलेगा ?’’ देवयानी के चेहरे पर उदासी छा गई।

‘‘क्यों तुम्हारे घर के और लोग काम नहीं करते ?’’

नहीं, दीदी। घर के नौकर-ताई और दादी के कहने से काम करते हैं। माँ को सबका काम करना होता है। माँ की मदद कोई नहीं करता। देवयानी के उज्ज्वल मुँह पर उदासी की छाया तैर गई।

‘‘ऐसा क्यो, देवयानी ?‘‘

‘‘हमारे पापा जो नहीं हैं, दीदी।’’ देवयानी की गंभीरता से कही गई बात ने महिमा जी के दिल को छू लिया। ये नन्हीं बच्ची अपनी स्थिति से कैसे समझौता कर रही है। उस दिन के बाद से महिमा जी, देवयानी पर विशेष ध्यान देने लगीं। खाने की छुट्टी के वक्त देवयानी के डिब्बे में रूखी रोटी और शायद रात की बासी सब्ज़ी देख, महिमा जी, देवयानी की स्थिति पूरी तरह समझ गईं। देवयानी की मेंधा उन्हें विस्मित करती, एक बार बताई गई बात देवयानी के मस्तिष्क में कम्प्यूटर की तरह अंकित हो जाती।

आठवी की परीक्षा में देवयानी को हर विषय में पूरे अंक मिले थे। पहले नम्बर पर आई देवयानी ने, अपना रिपोर्ट-कार्ड, बाबा को बड़े उत्साह से दिखाया।

‘‘बाबा, हम पूरे क्लास में फ़र्स्ट आए हैं। महिमा दीदी कहती हैं, हमे कुछ बनके दिखाना हैं।’’

रिपोर्ट-कार्ड देखते, कमलकांत की आँखों में चमक आ गई। उनका अमर भी हमेशा पहले नम्बर पर आता था। चाय पीते कमलकांत जी ने सबको बताया-

‘‘देवयानी अपने क्लास में फ़र्स्ट आई है। उसे कुछ इनाम मिलना चाहिए।’’

‘‘क्यों नहीं, उस स्कूल में पढ़ने वालों में देवयानी की स्थिति अंधों में काने राजा वाली ही तो है। रितु के स्कूल में पढ़ती तो देखते।’’ व्यंग्य से रागिनी ने ओंठ टेढ़े किए।

‘‘अगर हम रितु दीदी के स्कूल में पढ़ते तो भी हम फ़र्स्ट आते,-ताई। हम हमेशा पहले नम्बर पर रहे हैं।’’ कुछ अभिमान और खुशी से देवयानी ने जवाब दिया।

‘‘हाय राम, ज़रा देखो तो बित्ते भर की छोकरी और गज़ भर की जुबांन। बड़ों से बात करने की तमीज़ नहीं है।’’ रागिनी का क्रोध फूट पड़ा।

‘‘अरे, सब माँ का सिखाया-पढ़ाया है। ऊपर से चुप रहती है, पर अंदर से पूरी घुन्नी है।’’ अमर की माँ ने हामी भरते हुए, कल्याणी के प्रति अपना आक्रोश जताया।

‘‘नहीं, माँ हमें कभी ग़लत बात नहीं सिखातीं।’’ देवयानी की आँखें छलछला आईं।

उस बहसा-बहसी में देवयानी के इनाम की बात वैसे ही आई-गई हो गईं उस दिन के बाद से देवयानी अपना पूरा ध्यान पढ़ाई में लगाने लगी। उसके पापा कहते, अगर मन में पढ़ने की इच्छा हो तो कहीं भी स्कूल लग सकता है। पापा जब भी दूसरे गांवों तक ऊँट पर जाया करते तो साथ जा रही देवयानी को भूगोल और गणित के पाठ पढ़ाया करते। न जाने कितनी कविताएँ तो उसने ऊंट की सवारी में ही याद की थीं। देवयानी ने जब ये बात रितु और रोहन को बताई, तो वे ठठाकर हँसे पड़े। भला ऊंट की पीठ पर भी सकूल लग सकता हैं ? देवयानी को चिढ़ाने के लिए अब उन्हें एक और बात मिल गई। अब उसका नया नाम ‘‘ऊँट वाली लड़की’’ पड़ गया। बिना प्रतिवाद किए, देवयानी ने सबसे अपने को काट लिया। अब पुस्तकें ही उसकी मित्र थीं। महिमा जी उसे नई-नई किताबें देतीं और देवयानी उन्हें पा, खिल जाती।

धीमे-धीमे, देवयानी के ज़रिए महिमा जी को देवयानी और उसकी माँ की वास्तविक स्थिति ज्ञात हो गई। देवयानी की बातों में उनका अपना अतीत झाँकता लगता। देवयानी की तरह कभी वे भी चाचा के आश्रय में रहने को बाध्य हुई थीं, पर देवयानी तो अपने पिता के घर में ही तिरस्कृत थी। महिमा जी की आँखों के सामने उनके अतीत के चित्र उभरते आ रहे थे।

पिता की आकस्मिक मृत्यु के बाद, आठवीं कक्षा पास माँ के सामने अपनी तीन बेटियों का पेट भरने की समस्या थी। चाचा को माँ और बेटियाँ फूटी आँखों न सुहातीं’’

‘‘मरने वाले खुद तो चले गए, अपना बोझा हमारे सिर छोड़ गए। चार-चार प्राणियों का पेट भरना क्या आसान बात है।’’ चाची मुहल्ले की औरतों के सामने अपना दुखड़ा रोतीं।

सच्ची बात तो महिमा को कुछ दिनों बाद समझ में आई। पिता की मृत्यु के बाद भोली माँ से ज़ायदाद के कागज़ों पर धोखे से दस्तखत करा, उन सबका हिस्सा चाचा ने हड़प लिया। दिन-रात काम करने के बाद भी बचे-खुचे खाने पर ही संतोष करना पड़ता। तीनों लड़कियाँ जल्दी ही अपनी स्थिति समझ गई थीं। माँ सेन्हों ने कभी कोई माँग नहीं की।

चाचा के घरन के पास समाज-सेविका शांता बहिन जी आसपास की लड़कियों को पढ़ाया करती थीं। एक दिन महिमा उनके पास पहुँच गई।

‘‘हम भी पढ़ना चाहते हैं, बहन जी।’’

‘‘वाह ! ये तो बड़ी अच्छी बात है। कुछ पढ़ना-लिखना जानती हो ?’’ बहन जी ने प्यार से पूछा

 ‘‘नवीं पास की थी, मैट्रिक की परीक्षा की तैयारी की थी, पर बाबूजी नहीं रहे।’’

‘‘कोई बात नहीं, इस साल तुम मैट्रिक की परीक्षा दे सकती हो?’’

‘‘कैसे, बहन जी। चाची हम बहनों को पढ़ाई की इजाज़त नहीं देंगी।’’

‘‘ये ज़िम्मेदारी मेरी है, मैं तुम्हारे चाचा-चाचा से बात कर लूँगी।’’

चाचा के घर आई, शांता बहन जी उन चारों की स्थिति देख द्रवित हो गईं। चाची को समझाया, लड़कियाँ पढ़-लिखकर चार पैसे कमा सकती हैं, वर्ना उन्हें पूरी ज़िंदगी ढोना होगा। बात चाची की समझ में आ गई। सुबह जल्दी उठकर तीनों बहनें घर के काम निबटा, शांता बहन जी के पास पढ़ने जाने लगीं। महिमा  की माँ बहुत सुंदर कशीदाकारी और सिलाई जानती थीं। शांता बहन जी ने माँ को रात की कक्षा में पढ़ाना शुरू कर दिया।

तकलीफ़ें उठाकर भी अन्ततः तीनों की मेहनत रंग लाई। महिमा ने बी.ए. परीक्षा पास कर ली और माँ ने मंट्रिक की परीक्षा पास करके, सिलाई-कढ़ाई में डिप्लोमा ले लिया। शांता बहन जी के सहयोग से माँ को एक सिलाई-स्कूल में नौकरी मिल गई। महिमा ने प्राइवेट स्कूल में नौकरी करते हुए टीचर्स ट्रेनिंग भी पूरी कर ली। माँ-बेटी दोनों की नौकरी के बाद शांता बहन जी ने उन्हें अलग घर लेकर रहने की सलाह दी थी। महिमा जी को याद है, वो दिन उन सबके लिए कितनी बड़ी खुशी का दिन था। माटी के गणेश जी की स्थापना कर उन्होंने नई जिंदगी की शुरूआत की थी। आज महिमा जी, उनकी माँ और बहनें, नौकरी करके आत्मसम्मानपूर्ण जीवन जी रही हैं। महिमा जी को महसूस हुआ उन्हें जो जीवन शांता बहन जी की मदद से मिला है, उनका फ़र्ज़ है, वैसा ही जीवन देवयानी और उसकी माँ का दिलाने में सहयोग दें।

दो दिन बाद घर की छुट्टी के बाद महिमा जी ने देवयानी से कहा-

‘‘देवयानी, आज मुझे अपने घर ले चलोगी ?‘‘

‘‘आप हमारे घर चलेंगी, दीदी ?‘‘ खुशी से देवयानी का मुह चमक उठा।‘‘

“हाँ, देवयानी। ले चलोगी अपने घर?‘‘

‘‘ज़रूर दीदी, पर हमारा कमरा बहुत छोटा है। हम बस दो ही लोग हैं, न…….।‘‘ तुरन्त अपने छोटे कमरे के लिए देवयानी ने सफ़ाई दे डाली।

देवयानी के साथ कल्याणी के पास पहुँच महिमा जी ने, कल्याणी को चौंका दिया।

‘‘अरे, आप यहाँ ?‘‘ कल्याणी हड़बड़ा-सी गई।

‘‘क्यों, क्या एक बहन अपनी दूसरी बहन के घर नहीं आ सकती ?‘‘ सहास्य महिमा जी ने कहा।

‘‘नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं है। मुझे अपनी बहन कहकर आपने मेरी ज़िंदगी की एक बहुत बड़ी कमी पूरी कर दी।‘‘ कल्याणी की आँखों में आँसू झिलमिला उठे।

‘‘ठीक है, तो आज से हमारा रिश्ता पक्का हुआ। हम दोनों बहनें हैं, और देवयानी, मैं तुम्हारी मौसी हूँ। अब तुम मुझे दीदी नहीं, मौसी कहोगी, समझीं।‘‘

‘‘समझ गई, मौसी।‘‘ मुस्कराती देवयानी ने सबको हँसा दिया। महिमा जी ने कमरे में दृष्टि डाली तो एक अल्मारी में समाज-शास्त्र, हिन्दी आदि की किताबें देखकर पूछ बैठीं -

‘‘ये किताबें क्या देवयानी के पापा की हैं?‘‘

‘‘नहीं, वो चाहते थे, हम बी.ए. करके अपने पाँवों पर खड़े होने लायक बन सकें। ये सब हमारी किताबें हैं।‘‘

‘‘वाह ! मतलब तुमने बी.ए. की पढ़ाई की तैयारी की थी ?‘‘

‘‘हाँ, पर बीच में देवयानी के जन्म के बाद मेरा स्वास्थ्य इतना ख़राब हो गया कि परीक्षा नहीं दे सकी। उसके बाद तो वो खुद ही चले गए।‘‘ कल्याणी का स्वर भीग गया।

‘‘अमर जी की इच्छा पूरी करना क्या तुम्हारा फ़र्ज़ नहीं बनता है, कल्याणी ?‘‘

‘‘मतलब ? मैं समझी नहीं, महिमा।‘‘

अमर जी तुम्हें आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे और तुम पराश्रयी जीवन जी रही हो। क्या ये जीवन, उनकी इच्छा का अपमान नहीं है ?‘‘

‘‘मैं क्या कर सकती हूँ ? मेरी स्थिति बहू की नहीं, एक आश्रिता की है, महिमा।‘‘

‘‘तो अपनी इस स्थिति को सुधारो, कल्याणी। तुम्हें भी सम्मानपूर्ण जीवन जीने का अधिकार है।‘‘

‘‘मैं क्या करूँ, महिमा ?‘‘ कल्याणी का स्वर करूण था।

‘‘इन किताबों पर जमी धूल झाड़कर भूले हुए पाठ दोहराओ, कल्याणी। अगले वर्ष तुम्हें बी.ए. की परीक्षा देनी है।‘‘

‘‘सच, मौसी ? क्या माँ भी पढ़ेगी ?‘‘ देवयानी ताली बजाकर हँस पड़ी।

कल्याणी की आँखों के सामने एक नई दुनिया की तस्वीर खोलकर, महिमा जी चली गईं। कल्याणी के साथ देवयानी ने अल्मारी से पुस्तकें उतार, मेज़ पर सजा दीं। पुस्तकों कें पृष्ठों के बीच अमर का मुस्कराता चेहरा साकार था। अमर कहता -

‘‘पढ़ाई पूरी करके तुम्हें गाँव की स्त्रियों को सही अर्थों में शिक्षित करना है, कल्याणी, तभी तुम मेरी सच्ची जीवन-संगिनी बन सकोगी।‘‘

‘‘अच्छा जी, क्या अभी हम आपकी सही जीवन संगिनी नहीं है ?‘‘ मान भरे स्वर में कल्याणी कहती।

‘‘तुम मेरी जीवन-संगिनी नहीं, मेरा जीवन हो, कल्याणी।‘‘ अमर की प्यार भरी दृष्टि कल्याणी को सराबोर कर जाती।

सारे काम निबटाने के बाद देर रात तक कल्याणी किताबों में सिर झुकाए, पाठ दोहराती रहती। पुस्तकें खोलते ही जैसे अमर उसके पास आ बैठता। अब समस्या परीक्षा देने की थी। महिमा जी ने कमलकांत जी से विनम्र निवेदन किया-

‘‘अमर जी अपनी पत्नी को आत्म निर्भर बनाना चाहते थे। उसके लिए किताबें खरीदी थीं। बेटे की इच्छा पूरी करके आप उनकी आत्मा को शांति पहुँचा सकते हैं, पापा जी।‘‘

‘‘हमारे घर की बहू बाहर कॉलेज पढ़ने नहीं जा सकती।‘‘ रूखे स्वर में कमलकांत ने फ़ैसला दे दिया।

‘‘कल्याणी कॉलेज नहीं जाएगी, घर में ही पढ़ाई करेगी। मैं उसकी मदद करूँगी, आप बस परीक्षा देने की इजाज़त दे दीजिए।‘‘

‘‘मैं सोचकर जवाब दूंगा।‘‘

दो दिन कल्याणी ने बेचैनी में काटे। न जाने श्वसुर का क्या फै़सला होगा। अचानक देवयानी ने कमलकांत को चौंका दिया।

‘‘बाबा, अगर आप माँ का परीक्षा नहीं देने देंगे तो पापा आपसे नाराज़ हो जाएँगे। आप पापा की बात नहीं मानेंगे, बाबा ?‘‘

देवयानी की बात ने जैसे उन्हें निर्णय तक पहुँचा दिया -

‘‘ठीक है, तुम्हारी माँ परीक्षा दे सकती है, पर तुम्हें भी मेरी एक बात माननी होगी।

‘‘कौन-सी बात, बाबा ?‘‘

‘‘हमेशा फ़र्स्ट आती रहोगी, वर्ना तुम्हारे बाबा नाराज़ हो जाएँगे।‘‘ अचानक देवयानी के लिए उनके मन में ममता उमड़ आई।

‘‘थैंक्यू, बाबा। आप बहुत अच्छे हैं।‘‘ माँ को खुशख़बरी सुनाने, देवयानी चिड़िया-सी उड़ गई।

कल्याणी बी.ए. की परीक्षा देने के लिए जी-ज़ान से जुट गई। देवयानी ने नवीं कक्षा सर्वोच्च अंकों के साथ उत्तीर्ण की थी। अब मेट्रिक की पढ़ाई के लिए उसे तैयारी करनी थी। बाबा को दिखाना है, देवयानी हमेशा फ़र्स्ट आएगी।

वक्त गुज़रता गया। कल्याणी ने बी.ए. की और देवयानी ने मेट्रिक की परीक्षा दे दी। दोनों उत्सुकता से परीक्षा-परिणामों की प्रतीक्षा कर रही थीं। अन्ततः परिणाम आ ही गए। देवयानी को पूरे ज़िले में दूसरी पोज़ीशन मिली थी, सभी विषयों में डिस्टींकशन पाकर, उसने महिमा जी तक को विस्मित कर दिया। कल्याणी का परीक्षा-परिणम तो और भ चौंकाने वाला था। उसे बी.ए. में प्रथम श्रेणी मिली थी और समाज-शास्त्र में सर्वोच्च अंक थे।

महिमा जी ने कल्याणी को बधाई देकर कहा, ‘‘अब तुम्हें अपनी राह खोजनी है, कल्याणी। ग्रेज्युएशन के बाद कोई नौकरी मिल सकती है।‘‘ कल्याणी ने चुपचाप अख़बार में नौकरी के विज्ञापन देखने शुरू कर दिए। अमर के शब्दों में उसे अब शक्ति संपन्न नारी बनना था। अचानक एक दिन महिमा जी एक विज्ञापन के साथ आ पहुँची। विज्ञापन में एक स्थानीय कार्यालय में सहायक समाज-कल्याण अधिकारी पद के लिए महिला उम्मीदवारों से आवेदन माँग गए थे। प्रत्याशी के पास बी.ए. में समाज-कल्याण एक विषय होना आवश्यक था। महिमा जी की सलाह पर कल्याणी ने आवेदन दे दिया। कल्याणी को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया तो वह असमंजस में पड़ गई। पढ़ाई करने तक की बात तो मान ली गई, पर क्या उसे नौकरी करने जाने की इजाज़त मिल सकेगी ?

माँ की दुविधा, देवयानी ने दूर कर दी-

‘‘पापा के सपने सच करने के लिए तुमने जो कदम बढ़ाया है, माँ, उसे अब मत रोको। चुनौतियों का सामना करने के लिए साहस जुटाना ही होगा।‘‘

ग्यारहवीं में पढ़ रही अपनी बेटी को कल्याणी जैसे पहचान नहीं पा रही थी। वो तेजस्विनी, क्या कल की नन्हीं बालिका देवयानी थी ?

अन्ततः कल्याणी ने साक्षात्कार देने जाने का निर्णय ले ही लिया। साक्षात्कार में कल्याणी की सादगी, सच्चाई और प्रतिभा ने इंटरव्यू बोर्ड के लोगों को बहुत प्रभावित किया। कल्याणी का चयन हो गया। कल्याणी को बधाई देकर महिमा जी ने कहा -

‘‘इस पद पर कार्य करते हुए शोषित स्त्रियों का कल्याण कर सको, यही मेरी कामना है।‘‘

‘‘ठीक कहती हो, मौसी, पर सबसे पहले तो माँ को अपने को शोषण-मुक्त कराना होगा। देखना है, माँ की नौकरी की बात लेकर आने वाले भूचाल का, माँ कैसे सामना करती है।‘‘ सहास्य कही देवयानी की बात में सच्चाई थी।

कल्याणी की नौकरी की बात को लेकर घर में शोर मच गया। शशिकांत ने सारा दोष कमलकांत पर डाल दिया -

‘‘ये सब पापा का किया-धरा है। बड़ा शौक़ था, बहू पढ़ेगी। दुनिया वाले तो हमें ही भला-बुरा कहेंगे, भाई नहीं रहा तो उसकी बीवी को दो वक्त की रोटी भी नहीं खिला सके।‘‘

‘‘हमारे खांदान की बहू, बाहर नौकरी करने जाए ये तो नाक कटाने वाली बात हुई। हम तो किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रह जाएँगे।‘‘ सास ने बेटे की बात का समर्थन किया।

‘‘रहने दो, दादी। माँ को इस घर में बहू का दर्ज़ा ही कब दिया गया है ? सच तो ये है, माँ के साथ जैसा बर्ताव किया जाता रहा है, खांदान की नाक तो उसके लिए नीची होनी चाहिए थी।‘‘ देवयानी का गोरा चेहरा उत्तेजना से लाल पड़ गया।

‘‘एहसानफ़रामोश लड़की, अगर हमने रोटी न दी होती तो भूखी मरती।‘‘ शशिकांत क्रोध से हाँफ़ उठे।
‘‘रोटी दी तो कौन-सा एहसान किया, ताऊजी। मेरा भी इस घर पर उतना ही हक है, जितना रितु और रोहन का है।‘‘

‘‘अच्छा, मुझसे हक की बात करती है। अभी तेरी औक़ात बताता हूँ।‘‘ शशिकांत के देवयानी को थप्पड़ मारने को उठे हाथ को, देवयानी ने दृढ़ता से पकड़कर रोक लिया।

‘‘नहीं, अब और अन्याय नहीं सहेंगे।‘‘

कल्याणी डर गई। उसकी बेटी पूरे खांदान से टक्कर ले रही है हाथ जोड़कर माफ़ी माँग बैठी-

‘‘इसे माफ़ कर दीजिए, भाई साहब। ये अभी नादान है। ग़लती हो गई।‘‘

‘‘नहीं, मां। मैने कोई ग़लती नहीं की और तुम किनके आगे हाथ जोड़ रही हो? याद है, पापा कहते थे, अन्याय करने वाला और अन्याय सहने वाला, दोनों अपराधी होते हैं।‘‘

‘‘वाह री छोकरी। माँ को चार पैसे की नौकरी क्या मिल गई, बड़ी-बड़ी बातें बना रही है। इतने दिनों तक क्यों चुपचाप अन्याय सहती रही ? रागिनी ताई ने हाथ नचाकर कहा।

‘‘ठीक कहती हो, ताई। ज्वालामुखी का उदगार तभी होता है, जब उसके गर्भ में लावा उबलने लगता है। अब मेरे अंतर में भी आक्रोश उबल रहा है।‘‘

देवयानी के दृढ़ शब्दों ने सबको चौंका दिया। अमर की माँ को लगा, जैसे देवयानी में उनका अमर ही बोल रहा था। जब कभी दोनों भाइयों में लड़ाई होती तो अपनी बात की सच्चाईं बताते अमर का चेहरा भी तो बिल्कुल ऐसा ही लाल हो जाता था। उस वक्त उनके मन में देवयानी के लिए ममता का ज्वार-सा उमड़ आया। ये उनके अमर की वही बेटी थी, जिसे उन्होंने न कभी प्यार से चिपटाया न बात की। कल्याणी के प्रति आक्रोश की वजह से उसकी बेटी भी दुश्मन ही लगती रही। नहीं-नहीं, देवयानी से उनका कोईं रिश्ता नहीं, वो कल्याणी की बेटी है। अपनी ममता को झटक, वो वहाँ से चली गईं।

शशिकांत ने अपना फ़ैसला सुना दिया- ‘‘अगर कल्याणी को नौकरी करनी है तो खुशी से करे, पर उस स्थिति में कल्याणी और देवयानी को उस घर में रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती।‘‘

सौभाग्यवश कल्याणी को कार्यालय की ओर से दो कमरों वाला घर दिया गया था। देवयानी के उत्साह ने घर छोड़ने के डर को, दूर कर दिया। कल्याणी का घर शहर के कोलाहल से दूर था। चारों ओर शाल और महुआ के पेड़ों की हरियाली थी। नया घर पाकर देवयानी को जैसे नईं ज़िंदगी मिल गईं। छोटे से बंद कमरे की जगह खुला घर और हरा-भरा परिवेश उसे गाँव के घर की याद दिला जाता।

घर के पीछे वाला महुआ, रात भर रोता और सुबह होते ही पास के गाँव की लड़कियाँ महुआ बटोरने आ जातीं। महुए की मीठी खुशबू वातावरण को मिठास से भर देती। उन्हीं लड़कियों में से एक लड़की पारो थी। अचानक एक सुबह कल्याणी के सामने आ खड़ी हुई।

‘‘घर में काम कराने का है, दीदी ?‘‘

‘‘कैसा काम करेगी, नाम क्या है, तेरा ?‘ कल्याणी ने हँस कर पूछा।

‘‘पारो, जो काम दोगी, करेंगे।‘‘

‘‘पगार क्या लेगी, पारो ?‘‘

‘‘पगार का क्या है, दीदी ? जो भी पैसा होगा, बापू छीनकर दारू पी जाएगा।‘‘ पारो हँस दी।

‘‘क्यों, मेहनत तुम करो और पैसा बापू छीन ले। अपनी मेहनत की कमाई पर तुम्हारा हक़ है, पारो।‘‘ देवयानी उत्तेजित हो उठी।

‘‘छोटी बीबी, ये तो गाँव के घर-घर की कहानी है। औरत कमाई करती है और उसका मरद दारू पीकर मस्ती करता है।‘‘ पारो उदास हो आई।

‘‘तुम्हारा मरद भी ऐसा ही करेगा, पारो ?‘‘ देवयानी ने ताज़्जुब से पूछा।

‘‘नहीं-नहीं, चंदन ऐसा नहीं है। वो स्कूल में पढ़ता था। अब ठेकेदार के साथ काम करता है।‘‘ पारो के चेहरे पर लजीली मुस्कान आ गई।

‘‘चंदन तेरा आदमी है, पारो ?‘‘ कल्याणी ने पूछा।

‘‘अभी हमारी शादी नहीं हुई है, पर चंदन कहता है, वो बस हमसे ही शादी कारेगा।‘‘ पारो हँस रही थी।

‘‘ठीक है, तू घर के कामकाज में हमारी मदद करेगी, पर अपनी पगार अपने पास ही रखेगी।‘‘ देवयानी ने चेतावनी दी।

दूसरे दिन से पारो काम पर आने लगी। घर में झाड़ू-बुहारू, बर्तन-बासन साफ़ करके भी उसके पास काफ़ी वक्त गाँव की कहानियाँ सुनाने के लिए बच जाता। पारो की बातों से गाँव की स्त्रियों की दुखद स्थिति स्पष्ट हो जाती। कल्याणी को लगता, काश् वह उनके लिए कुछ कर पाती।

बारहवीं कक्षा में देवयानी के साथ एक नई लड़की सुष्मिता ने प्रवेश लिया। सुष्मिता की सादगी और गांभीर्य ने देवयानी को आकृष्ट किया। जल्दी ही दोनों अच्छी सहेलियाँ बन गईं। दोनों के जीवन में भी बहुत समानता थी। दोनों के पिताओं का जीवन गाँव में बीता था। सुष्मिता के पिता गाँव म डॉक्टर थे। दोनों के पिता अपनी बेटियों को डॉक्टर बनाना चाहते थे। अब घर आकर देवयानी अक्सर सुष्मिता की ही बातें करती। सुष्मिता जब पाँच वर्ष की थी, उसकी माँ की मृत्यु हो गई। कल्याणी के साथ उसे माँ की कभी पूरी होती लगती।

वक्त पंख लगाकर उड़ जाता है, कहावत सच लगती है। देवयानी ने बारहवीं की परीक्षा देकर मेडिकल एंट्रैंस-परीक्षा दे दी। न जाने क्यों सुष्मिता ने डाक्टर बनने का ख़्याल, अचानक छोड़ दिया। देवयानी के लाख पूछने पर उसका एक ही जवाब था-

‘‘मैं टीचर बनना चाहती हूँ, देवयानी। टीचर बनकर गाँव की लड़कियों को सही दिशा दूँगी।‘‘

‘‘डाॅक्टर बनकर भी तो तू वही काम कर सकती है, सुबी ?‘‘

‘‘नहीं, देवयानी, मेरे अपने कारण हैं। मैं अपना निर्णय नहीं बदल सकती।‘‘ हढ़ता से ओंठ भींच सुष्मिता ने कुछ और कहने का मौक़ा ही नहीं दिया।

बारहवीं की परीक्षा में भी देवयानी को सभी विषयों में डिस्टींक्शन के साथ सरकार की योग्यता छात्रवृत्ति भी मिल गई। मेडिकल एंट्रैंस परीक्षा का परिणाम और भी ज़्यादा उत्साहजनक था। माँ की सुविधा को ध्यान में रखकर देवयानी ने उसी शहर के मेडिकल कॉलेज में प्रवेश ले लिया।

हल्के गुलाबी रंग के सलवार सूट में कॉलेज पहुँची देवयानी की सादगी में अनोखा सौंदर्य था। चेहरे पर चमकता आत्मविश्वास और बुद्धि का तेज़ उसे अपूर्वा बना जाता था। सीनियर बैच रैगिंग कर रहा था। देवयानी को भी रोक लिया गया-

‘‘अपना नाम बताइए, मोहतरमा ?‘‘

‘‘देवयानी।‘‘

‘‘वाह भई, क्या दक़ियानूसी नाम छाँट कर रखा है। आपका नाम तो कामायनी होना चाहिए था। साक्षात् काम की प्रतिमा हैं।‘‘ सीनियर छात्र रोहित ने रिमार्क कसा।

‘‘जिन्हें भारतीय संस्कृति से प्यार है, उन्हें देवयानी नाम का अर्थ ठीक समझ में आ सकता है। ये नाम मेरे पापा ने दिया है और किसी भी कीमत पर इस नाम का उपहास, मुझे पसंद नहीं।‘‘ गंभीरता से देवयानी ने कहा।

‘‘अरे रे रे, ग़लती हो गई। आपके पापा हमें कड़ी सज़ा वो नहीं देंगे।‘‘ व्यंग्य से मोहनीश ने दयनीय मुँह बनाया।

‘‘पापा किसी को सज़ा कैसे दे सकते हैं, तो बहुत पहले ही इस दुनिया से जा चुके हैं। वैसे भी मेरे पिता सज़ा में नहीं, क्षमा में विश्वास रखते थे। ‘‘ देवयानी का चेहरा उदास हो आया।

‘‘सॉरी। आपका दिल दुखाने का हमारा कतई इरादा नहीं था, देवयानी।‘‘ रोहित ने सच्चे दिल से क्षमा माँगी।

‘‘आपकी गंभीरता देखकर लगता है, आप हम जैसों-सी मस्त मौला नहीं, पढ़ाकू टाइप लड़की दिखती हैं। क्यों ठीक समझा न ? बाई दि वे टवेल्थ में कितने परसेंट मार्क्स मिले थे ?‘‘ मोहनीश ने माहौल हल्का करना चाहा।

‘‘ नानटी सिक्स परसेंट (96%) अंक मिले थे।‘‘ शांति से देवयानी ने जवाब दिया।

‘‘ओह माई गॉड। यानी कि आपने ही टॉप किया होगा ?‘‘ रोहित विस्मित था।

‘‘जी नहीं, मेरी तीसरी पोजीशन थी।‘‘

‘‘यार। आजकल नम्बर मुफ़्त में लुटाए जाते हैं, ख़ासकर लड़कियों पर एक्जा़मिनर्स ज़्यादा मेहरबान होते हैं, तेरा क्या ख़्याल है, रोहित ?‘‘

‘‘माफ़ कीजिए। कॉपी पर नाम नहीं रोल नम्बर लिखे जाते हैं।‘‘ देवयानी मुस्करा रही थी।

‘‘चलिए, आप हँसी तो। वैसे देवयानी जी पाश्चात्य संगीत के बारे में आपके क्या विचार हैं ? अगर एक पॉप साँग गा दें तो आपकी रैगिंग ख़त्म।‘‘ रोहित ने वादा किया।

सधे मीठे गले से देवयानी ने एक पाश्चात्य गीत गाकर सबको मुग्ध कर लिया। गीत समाप्त होने के बाद कुछ पलों को सन्नाटा रहा फिर समवेत तालियों ने देवयानी का अभिनंदन-सा किया।

‘‘थ्री चियर्स फ़ॉर मिज़ देवयानी‘‘

‘‘हिप-हिप हुर्रे।‘‘

‘‘आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई। उम्मीद है, हम अच्छे मित्र बन सकेंगे।‘‘ रोहित के बढ़े हाथ के उत्तर में देवयानी ने हाथ जोड़ दिए।

घर लौटी देवयानी ने माँ को अपनी रैगिंग की कहानी सुनाई। कल्याणी देवयानी के उत्साहित प्रसन्न मुख को देखकर खुश हो गई।

‘‘आज तेरे चेहरे पर तेरी सफलता की कहानी पढ़ पा रही हूँ, देवयानी। तेरे पापा का सपना ज़रूर सच होगा। तू एक नामी डॉक्टर बनेगी।‘‘

‘‘नामी नहीं, एक अच्छी डॉक्टर बनना चाहूँगी। पापा का गाँव मेरा कर्म-क्षेत्र होगा, माँ।‘‘

‘‘तेरे पापा की इच्छा थी, मै गाँव की औरतों को सही दिशा दूँ। एक योजना मेरे दिमाग़ में आई है।‘‘

‘‘वाह, माँ अब तो जल्दी से अपनी योजना बता डालो।‘‘ देवयानी खुश थी।

‘‘देख, हमारे ऑफ़िस में ग्रामीण स्त्रियों के विकास के लिए फंड आया है। मैं सोच रही हूँ, पारो के गाँव की औरतों के विकास के लिए ऐसी योजना तैयार करूँ जिसके द्वारा उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सके।‘‘

‘‘ये तो बड़ी अच्छी बात होगी, माँ। मुझे पूरा विश्वास है, तुम्हारी योजना सफल होगी।‘‘

कल्याणी ने महिमा जी के साथ भी अपनी योजना की चर्चा की। महिमा जी ने कल्याणी को योजना में समर्थन देने का विश्वास दिलाया। योजना बनाने के पहले औरतों की स्थिति और उनकी ज़रूरतें जानना ज़रूरी था। कल्याणी और महिमा जी ने गाँव जाकर सर्वे करने का निश्चय किया।

पारो ने गाँव की औरतों को इकट्ठा कर रखा था। कल्याणी ने औरतों से बात करनी शुरू की, उनसे कहा, उन सबके पास कोई न कोई हुनर है। अपने इसी हुनर के ज़रिए वे पैसे कमा सकती हैं। अपने बच्चों को अच्छा खिला-पिला सकती हैं, उन्हें पढ़ा सकती हैं। शरबती ने उठकर कहा-

‘‘ये बातें सुनने में अच्छी लगती हैं, पर गाँव की अनपढ़ औरतों के हुनर की कौन कदर करेगा, दीदी?‘‘

‘‘ऐसी बात नहीं है, शरबती। आजकल गाँव की बनी चीज़ो की तो बाहर के देशों तक में माँग है।‘‘ महिमा जी ने समझाया।

‘‘हमे घर के काम निबटाने होते हैं। चूल्हा जलाने को सूखी लकड़ी पत्ते बटोरने होते हैं। कामकाज सीखने का बखत कहाँ से मिलेगा।‘‘ शीलो ने समस्या बताई।

‘‘देखो शीलो, जहाँ चाह-वहाँ राह। अगर ठीक से सोचकर काम किया जाए तो हर काम के लिए वक्त निकाला जा सकता है।‘‘ कल्याणी ने कहा।

‘‘आप की बात और है, दीदी। हम दिहात की औरतों की बात अलग है।‘‘ कजरी ने गहरी साँस ली।

‘‘नहीं, कजरी। हममें और तुममें बस एक फ़र्क है। हमने शिक्षा पाई है। हम सही-ग़लत समझ सकते हैं। अगर तुम भी पढ़ाई करो तो तुम भी अपना भला-बुरा समझ सकती हो।‘‘ कल्याणी ने कहा !

“अरे अब क्या हमारी पढने की उमर है? यह तो वही बात हुई बूढी घोड़ी लाल लागाम्।” जमीला चाची ने कहा।

‘‘अरे वाह ज़मीला चाची, तुम तो कहावत बोल रही हो। वैसे सच बात ये है, पढ़ने की कोई उमर नहीं होती। हमारी अम्मा ने तुम्हारी उमर में पढ़ाई पूरी करके नौकरी की और हम तीन बहनों को पढ़ाया।‘‘ महिमा जी ने अपनी कहानी दोहराई।

‘‘सच। क्या हम पढ़ सकते हैं ?‘‘ ज़मीला के चेहरे पर विस्मय था।

‘‘ज़रूर पढ़ सकती हो, चाची, पर गले में लाल लगाम डालनी होगी।‘‘ पारो ने ज़मीला को चिढ़ाया।

‘‘ठहर तो लड़की। आज चंदन से कहेंगे तेरे गले में लाल चूनर डाल, जल्दी से ले जा। बहुत पर निकल आए हैं, छोकरी के।‘‘

‘‘अरे चाची, ये बात जल्दी कह दो, हमारा तो भला ही होगा।‘‘ पारो खुलकर हंस दी।

‘‘देख रही हैं, दीदी। पारो कैसी बेशरम हो गई है। अपनी शादी की बात खुद कर रही है।‘‘ शीलो भी हँस रही थी।

‘‘अरे से सब चंदन की सोहबत का असर है। वो पढ़ा-लिखा, नए ज़माने का लड़का जो ठहरा। वो तो पारो को भी पढ़ाता है।‘‘ शरबती ने जानकारी दी।

औरतों में हास-परिहास चल रहा था कि सामने से कमीज़-पैंट पहने एक युवक आ पहुँचा। उसे देखते ही पारो का चेहरा खिल उठा। ज़मीला ने उसे आड़े हाथों ले लिया-

‘‘क्यों रे, चंदन। काम-काज छोड़कर, होने वाली बहुरिया के पीछे दौड़ा आया है। सुन ले, पारो की लगाम कस कर बाँधे रखना वर्ना ये घोड़ी न जाने कौन राह जाए।‘‘

‘‘अरे चाची, तुम्हारे रहते भला पारो ग़लत राह जा सकती है। पारो ने बताया था, औरतों से बात करने दो दीदी आ रही हैं, सो उनसे मिलने चला आया।‘‘ मुस्कराते चंदन ने कहा।

‘‘हाँ, चंदन। हम गाँव की औरतों की तरक्की के लिए पढ़ाई के साथ कुछ काम शुरू कराना चाहते हैं। इन कामों के लिए उन्हें ट्रेनिंग दी जाएगी।

‘‘वाह ! ये तो बड़ी अच्छी बात है। सबसे पहले तो पारो को अपनी शिष्या बना लीजिए। इसे पढ़ा-लिखाकर कुछ अक्ल दे दीजिए।‘‘ पारो की ओर कनखियों से देख, चंदन मुस्करा दिया।

‘‘अच्छा जी, क्या हम बेअकल हैं? जाओ, हम तुमसे बात नहीं करेंगे।‘‘ पारो ने मान दिखाया।

‘‘नहीं, पारो, तुम तो बुद्धिमान लड़की हो। तुम्हारी मदद से ही तो गाँव में काम शुरू कर पाएंगे।‘‘ कल्याणी ने पारो को प्यार से देखकर कहा।

‘‘दीदी, आप हम लोगों को कौन-से काम कराएँगी ?‘‘ अब तक चुप बैठी युवती बन्तो ने पूछा।

‘‘देखो तुममें से बहुत-सी औरतें घर में सूत कातती हैं, चटाई, मूढ़े बनाती हैं, सिलाई-कढ़ाई करती हैं। अगर इन कामों को और ज़्यादा सुंदर ढ़ंग से किया जाए तो शहरों के बाज़ारों में बेचने से काफ़ी पैसा मिल सकता है।‘‘ कल्याणी ने बताया।

‘‘इतना ही नहीं, अचार-चटनी, पापड़, बड़ी-मुंगौरी जैसी चीज़ो की भी शहर में खूब माँग रहती है। घर जैसी चीज़ें सभी पसंद करते हैं।‘‘ महिमा जी ने प्यार से समझाया।

‘‘तुम जो सूत बुनती हो उससे हथकरधे पर कपड़ा बुनना सीख सकती हो।‘‘ चंदन ने भी जानकारी दी।

‘‘दीदी, आप हमें जो सपने दिखा रही हैं, वो सच कैसे होंगे ? हमारे मरदों को तो बस दारू चाहिए। हम कमाएँगे वो उड़ाएँगे।‘‘ शीलो ने दुख से कहा।

‘‘हाँ, दीदी। अगर हम पढ़ना चाहें तो भी नाराज़ होते हैं। मरदों को लगता है, अगर हम पढ़ गए तो उनकी बात नहीं सुनेंगे।‘‘ नादिरा ने कहा।

‘‘ठीक है, हम गाँव के मरदों से बात करेंगे। एक बात कहना चाहूँगी, सही बात सुनना ठीक बात है, पर डर के कारण ग़लत बात के लिए दबना ठीक बात नहीं है।‘‘ कल्याणी ने दृढ़ता से कहा।

‘‘देखो, औरतों में बहुत ताकत होती है। अपनी ताकत पहचानना ज़रूरी है। जानती हो आंध्र प्रदेश में गाँव की औरतों ने एक जुट होकर अपने मरदों की शराब-बंदी करा दी।‘‘ महिमा जी ने जोश से कहा।

‘‘क्या, औरतों ने मरदों की शराब-बंदी करा दी, कैसे दीदी ?‘‘ कजरी के चेहरे पर ढ़ेर सारा आश्चर्य था।

‘‘हाँ, कजरी। औरतों ने मिलकर शराब-बंदी के लिए जुलूस निकाले, नारे लगाए, शराब की बुराइयों पर गीत गाए। वहाँ की सरकार को भी उनकी मदद करनी पड़ी।‘‘ महिमा जी ने बताया।

‘‘हाँ, औरतों ने शराब की भट्टियों पर धरने दिए। शराब पीकर आए मरदों के लिए घर के दरवाज़े नहीं खोले। आख़िर मरदों को हार माननी पड़ी।‘‘ कल्याणी ने तस्वीर-सी खींच दी।

‘‘हाय दैया, क्या हम भी ऐसा कर सकते हैं ?‘‘ शीलो ने पूछा।

‘‘क्यों नहीं, पर तुम सबको एक जुट होना पड़ेगा।‘‘

‘‘अरे ये क्या एकजुट होंगी, दीदी। ज़रा-ज़रा-सी बात पर तो लड़ती हैं।‘‘ चंदन ने सच्चाई बयान कर दी।

‘‘ऐ चंदन, अगर हम लड़ते-झगड़ते हैं तो क्या ? वक्त-ज़रूरत में एक-दूसरे के लिए दिन-रात भी तो एक करते हैं। बड़ा आया बातें बनाने वाला।‘‘ ज़मीला चाची ने गुस्सा दिखाया।

‘‘ये हुई न बात। अब दीदी जैसा कहें, उसके लिए एकजुट होकर दिखाओ, चाची।‘‘ चँदन हंस रहा था।

‘‘हाँ-हाँ, हम दिखा देंगे। औरतें हैं तो क्या हम सब मिलकर गाँव के मरदों को सही राह दिखा देंगे।‘‘ शीलो ने जोश से कहा।

‘‘अरे शीलो मौसी, कहीं मुझे ही तो सही राह नहीं दिखा दोगी।‘‘ चंदन ने परिहास किया।

‘‘घबरा मत। तुझे सही राह दिखाने के लिए हमारी पारो ही काफ़ी है।‘‘ बन्तो हँसी।

‘‘बाप रे , किसका नाम ले लिया। अब तो यहाँ से भाग जाने में ही भलाई है। प्रणाम दीदी, भगवान आपकी मदद करें।

चंदन के जाते ही औरतें हँस पड़ीं। पारो का चेहरा लाज से लाल हो उठा। कल्याणी और महिमा जी आज की बातचीत से संतुष्ट वापस आईं। फ्रेशर्स की रैगिंग के बाद कॉलेज के सीनियर्र्स फ्रेशर्स को पार्टी देते थे। एक लाल गुलाब के साथ रोहित ने देवयानी को अलग़ से इन्वाइट किया।

‘‘कल शाम आप मेरी मेहमान रहेंगी। ये रहा आपका निमंत्रण।‘‘ कार्ड और गुलाब रोहित ने थमाया।

‘‘निमंत्रण के साथ गुलाब का फूल देने की क्या आपके कॉलेज की परंपरा है ?‘‘ मुस्कराती देवयानी ने जानना चाहा।

‘‘नहीं, ये गुलाब हमारी मित्रता का प्रतीक है। आपको गुलाब पसंद हैं?‘‘

‘‘गुलाब तो फूलों का राजा ही है। हाँ, वैसे मुझे ये बहुत प्रिय है। थैंक्स।‘‘ गुलाब पर प्यार भरी नज़र डालती देवयानी ने कहा।

‘‘इसका मतलब मैं भी आपका प्रिय हुआ ?‘‘ रोहित के चेहरे पर शरारत आ गई।

‘‘जी नहीं। आप गुलाब के काँटे हो सकते हैं क्योकि गुलाब के साथ काँटे होते ही हैं।‘‘ देवयानी ने भी परिहास का सीधा जवाब दे डाला।

‘‘चलिए काँटा ही सही, कोई तो रिश्ता हमारे बीच बन ही गया। कल शाम आपका इंतज़ार करूँगा। आएँगी न ?‘‘

‘‘अगर माँ से इजाज़त मिली तो ज़रूर आऊँगी। देर रात तक बाहर रहना माँ को पसंद नहीं है।‘‘ गंभीरता से देवयानी ने कहा।

‘‘मैं उनकी बात समझ सकता हूँ। यकीन कीजिए, आपको रात में अकेले वापस जाने की गुस्ताख़ी मैं भी नहीं कर सकता। प्रोग्राम में सभी लड़कियों को वापस पहुँचाने का इंतज़ाम रहेगा। आपको सही-सलामत घर पहुँचाने की जिम्मेदारी मेरी रही।‘‘

‘‘थैंक्स। मैं आने की कोशिश करूँगी।‘‘

‘‘कोशिश नहीं, वादा करना होगा वर्ना प्रोग्राम छोड़, आपको लेने घर पहुँच जाऊँगा। मुझ पर रहम कीजिएगा, मोहतरमा।’’

‘‘मुझ पर ये ख़ास मेहरबानी क्यों, रोहित जी ? क्या आप सबको ऐसे ही निमंत्रित कर रहे हैं?’’

‘‘ओह नो! सच बात ये है कि आप दूसरों से बिल्कुल अलग हैं। आपकी असाधारणता से मै प्रभावित हूँ, ऐंड दैट्स ऑल। बाय।

देवयानी के जवाब का इंतज़ार किए बिना, रोहित चला गया। देवयानी गुलाब के फूल को देखती सोच में पड़ गई। रोहित ने उसमें ऐसा क्या देखा, जो दूसरी लड़कियों में नहीं था।

घर पहुँची देवयानी को कल्याणी ने अपनी गाँव-यात्रा की कहानी उत्साह से सुनाई। माँ के चेहरे की खुशी देख, देवयानी का मन माँ के प्रति सम्मान और करूणा से भर आया। अगर पापा होते तो माँ को उनका साथ और साहस मिलता। माँ की सफलता पापा को कितना खुश करती। देवयानी ने हाथ में पकड़ा गुलाब माँ को देते हुए कहा-

‘‘श्रीमती कल्याणी जी की पहली सफलता के लिए ये गुलाब भेंट करती हूँ।‘‘

‘‘अरे वाह ! ये तो बड़ा प्यारा गुलाब है, कहाँ से लाई ?’’

‘‘मेरे सीनियर्स कल  हम फ़्रेशर्स को पार्टी दे रहे हैं। निमंत्रण के साथ मित्रता का प्रतीक, ये गुलाब दिया गया है।’’ न जाने क्यों देवचानी रोहित का नाम नहीं ले सकी।

‘‘वाह ! ये तो बड़ी अच्छी परंपरा है। पहले रैगिंग में परेशान करो, फिर पार्टी और फूल देकर दोस्ती करो।’’ कल्याणी खुले दिल से हँस दी।

‘‘हाँ, माँ, कहते हैं रैगिंग से परिचय गहरा होता है। वैसे सीनियर्स रैगिंग में भले ही कितना भी परेशान करें, बाद में जूनियर्स की बहुत मदद करते हैं।’’

‘‘ठीक कहती है। तू खाना खाकर सो जा, मैं काम करूँगी।’’

‘‘अब रात में कौन-सा काम करना है, माँ ?’’

‘‘अरे आज गाँव में जो सर्वे किया है उसके आधार पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करूँगी तभी तो फंड मिल सकेगा। बस यही चाहती हूँ, मेरी प्रोजेक्ट स्वीकार कर ली जाए।’’ कल्याणी की बातों में उत्साह और खुशी दोनों थीं।

‘‘तुम्हारी योजना जरूर स्वीकार की जाएगी, माँ। जो काम सच्चाई और ईमानदारी के साथ किया जाता है, उसमें जरूर सफलता मिलती है।’’

‘‘भगवान तेरी बात सच करें।’’

देर रात तक कल्याणी अपनी योजना तैयार करती रही। पेन रखने के बाद उसके चेहरे पर संतोष की झलक थी। देवयानी को चादर ओढ़ा, जब वो पलंग पर लेटी तो पुरानी यादें साकार होने लगीं।

बारहवीं की परीक्षा की तैयार कर रही कल्याणी कभी-कभी मेज़ पर सिर टिका सो जाती थी। सोती कल्याणी को प्यार से उठा, अमर चारपाई पर ले जाता था। दूसरे दिन सुबह परिहास में कहता-

‘‘तुम्हें अपना वज़न घटाना चाहिए, कल्याणी वर्ना ये बंदा तुम्हें उठाते, बेमौत मर जाएगा।’’

‘‘अच्छा, तुम्हें हम भारी लगते हैं। याद रखो, बाबूजी के अंतिम समय में तुमने हमारा भार उठाने का वादा किया था।’’

अचानक कल्याणी की आँखें भीग आईं। मास्टर पिता के लिए कल्याणी ही सब कुछ थी। लू लग जाने से व्याकुल पिता को कल्याणी की ही चिन्ता थी। उस वक्त उनकी व्याकुलता देख, अमर ने वचन किया था, वह कल्याणी से विवाह करेगा। बस इतनी बात सुनने के लिए ही वह जीवित थे। मास्टरजी को चिन्ता-मुक्त कर, अमर ने अपना वचन निभाया था। घर-परिवार से निष्कासन का दुख उसे अन्दर जरूर सालता होगा, पर उसके मुँह से कभी एक शब्द भी नहीं निकला। देवयानी के जन्म के समय उसने माँ के पास बेटी के जन्म की सूचना भेजी थी, कोई जवाब न पा, उसके चेहरे पर अवसाद की छाया बस कुछ देर के लिए झलकी भर थी। देवयानी को गोद में उठा, प्यार से कहा था-

 ‘‘हमारी बेटी डॉक्टर बनेगी। हमारे बुढ़ापे में हमारी देवयानी ही हमारी देखरेख करेगी, कल्याणी’’ आज देवयानी डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही है, पर अमर कहाँ है ? काश, अमर उनके साथ होता।

करवट बदलती देवयानी का हाथ माँ के नम चेहरे पर चला गया-

‘‘ये क्या माँ, तुम रो रही हो ? पापा की याद आ रही है ?’’

नन्हीं बच्ची-सी माँ को प्यार से दुलारती देवयानी कुछ देर को कल्याणी की माँ ही बन गई। सुबह कल्याणी के उत्फुल्ल चेहरे को देख, देवयानी खुश हो गई। क्लांति का कहीं चिन्ह भी नहीं था।

‘‘दैट्स लाइक. माई ब्रेव मदर.। आज कितने दिनों बाद तुम खुश हो माँ।

‘‘वो तो ठीक है, देवयानी, पर कभी सोचती हूँ, क्या उनके परिवार वालों से अलग रहने की वजह से तेरे पापा की आत्मा को दुख तो नहीं होता होगा ?’’

‘‘मम्मी, तुम किस दुनिया की बात सोचती हो। मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में कौन जानता है ? आज जो है, बस वही सच है, उसी में जीना चाहिए।’’

‘‘वाह ! मेरी देवयानी तो फ़िलॉसफ़ी झाड़ने लगी है।’’

‘‘अरे याद आया। माँ आज की पार्टी में जाऊँ ?’’

‘‘तू अकेली कैसे लौटेगी, देवयानी।’’

‘‘लड़कियों को पहुँचाने का इंतज़ाम है, माँ तुम परेशान मत होना।’’

‘‘ठीक है, कौन-सा सूट पहनकर जाएगी ?‘‘

चाहे तो मेरी आसमानी तारों वाली साड़ी पहन जा।’’

‘‘ओह, माँ। मैं कॉलेज की पार्टी में जा रही हूँ, किसी की शादी में थोड़ी जा रही हूँ। कोई-सा भी सूट पहन लूँगी।’’ देवयानी मुस्करा उठी।

‘‘हो सकता है, मुझे लौटने में देर हो जाए। तू घर बंद करके चाभी लेती जाना।’’

‘‘ओ.के. माँ। मैं जानती हूँ, मेरी माँ कामकाजी महिला हैं। अब उसके पास अपनी बेटी के लिए वक्त नहीं है।’’ देवयानी ने चिढ़ाया।

‘‘तू ऐसा सोचती है, देवयानी ? अगर ऐसी बात है तो मैं गाँव की प्रोजेक्ट जमा नहीं करूँगी।’’

‘‘अरे रे रे, तुम तो सच मान गईं। सच्चाई तो ये है, तुम्हें काम करते देख, मुझे बहुत खुशी होती है, माँ। क्या महिमा मौसी भी तुम्हारे साथ गाँव जाएँगी ?’’

‘‘हाँ, महिमा से मुझे जो प्यार मिला है, वो शायद अपनी सगी बहिन से भी नहीं मिल पाता।’’

‘‘सच, मौसी बहुत अच्छी हैं। उन्होंने हमारी ज़िंदगी बदल दी वर्ना……..’’

देवयानी का वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि महिमा आ गई।

‘‘किसने किसकी ज़िंदगी बदल दी देवयानी ?’’

महिमा ने सहास्य पूछा।

‘‘तुम्हारे ही बारे में बात कर रहे थे। अगर तुम हमारी ज़िंदगी में न आतीं तो हम उसी काल-कोठरी में रह जाते।’’ कल्याणी ने कहा।

‘‘अच्छा अब महिमा-पुराण रहने दो। तुम्हारी प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार है, कल्याणी ?’’

‘‘हाँ, रात भर लिखती रही। एक बार तुम भी देख लो। कोई कमी न रह गई हो।’’

दोनों को बातें करती छोड़, देवयानी कॉलेज के लिए तैयार होने चली गई।

ऑफिस में प्रोजेक्ट रिपोर्ट जमा करने के बाद सुनीता और कुसुम के साथ महिमा और कल्याणी गांव पहुँची। सुनीता और कुसुम भी समाज कल्याण विभाग में सहायक पद पर काम करती थीं। कल्याणी की बातें उन्हें अच्छी लगतीं, इसीलिए उन दोनों ने कल्याणी की योजना में साथ देने का निर्णय लिया था।

आज गाँव की औरतें नदारद दिखीं। पारो और बन्तो ने आकर बताया, गाँव के मरदों ने अपनी औरतों को कल्याणी दीदी की बातें न सुनने की सख़्त हिदायत दे रखी हे। जो औरत उनकी बातों में आएगी, उसे घर में जगह नहीं मिलेगी।

‘‘अरे वाह ! ये तो सरासर दादागिरी है। हमे कुछ करना होगा, कल्याणी।’’ महिमा तैश में आगईं।

‘‘हूँ, चलो, हम ग्राम- प्रधान जी से बात करेंगे।‘‘

‘‘उनसे बात करने का कोई फायदा नहीं होगा। वो भी तो मरद हैं, दीदी।‘‘ पारो ने शंका जताई।

‘‘मरद होने के साथ वो गाँव के प्रधान भी तो हैं। मुखिया परिवार की देखरेख करता है। गाँव की औरतें उनके परिवार की बहू-बेटियाँ हैं, उनकी भलाई देखना भी तो उनका काम है।’’ गंभीर कल्याणी ने कहा।

‘‘ये बात तो ठीक कही, दीदी। ठहरिए हम चंदन और उसके कुछ नौजवान साथियों को बुला लाते हैं। वो लोग भी आपका साथ देंगे। पारो चंदन को बुलाने दौड़ गई।

चदन के साथ पाँच-सात जोश से भरे नौजवान ग्राम-प्रधान के पास पहुँचे। पहले तो ग्राम प्रधान उनसे बात करने को ही तैयार नहीं थे, पर जब कल्याणी ने अपनी योजना विस्तार में समझाई तो बात उनकी समझ में आ गईं। उन्हें बताया गया अगर उनके गाँव की औरतें साक्षर और आत्मनिर्भर बन जाएँगी तो उसका श्रेय गाँव के प्रधान को दिया जाएगा। हो सकता है उनका गाँव सर्वश्रेष्ठ गाँव के रूप में पुरस्कृत किया जाए। सबसे बड़ी बात औरतों की आय से परिवारों का जीवन-स्तर ऊपर उठ सकेगा। जो भी खर्चा होगा, उसे कल्याणी के ऑफिस की सरकारी योजनाओं से दिया जाएगा। ग्राम-प्रधान ने गाँव के पुरूषों को समझाने का दायित्व ले, कल्याणी के साथियों को विदा किया।

देवयानी कालेज से जल्दी लौट आई। शाम के फ़ंक्शन की वजह से क्लासेज एक बजे ख़त्म कर दी गईं। अपने गिने-चुने कपड़ो में से शाम के लिए कपड़े चुनने में देवयानी को ज़्यादा देर नहीं लगी। माँ ने अपनी प्याज़ी साड़ी का सलबार-सूट देवयानी के लिए सिलवा दिया था। साड़ी के ज़रीदार किनारे ने सूट की शोभा बढ़ा दी। एक मेले से प्याज़ी मोती की माला और बुंदे, देवयानी ने शौक से खरीद लिए थे। सूट से साथ गले और कानों में मोती पहन, जब देवयानी ने आइने में अपने को निहारा तो चेहरे पर मुस्कान बिखर गई।

नियत समय पर पहुँची देवयानी के लिए रोहित प्रतीक्षा में खड़ा था। देवयानी को देखते ही उसके ओंठ गोल हो गए-

‘‘वाउ, यू लुक चार्मिंग। मुझे डर था कहीं आप न आएँ।‘‘

‘‘दोस्ती तो निभानी ही पड़ती है। आपने इतना प्यारा गुलाब जो दिया था।‘‘ देवयानी हल्के से मुस्करा दी।

‘‘थैंक्स,ग़ॉड। यानी मेरी दोस्ती कुबूल हो गई। आइए हॉल में चलें।‘‘

रंगीन झिलमिलाती झालरों के साथ रजनीगंधा की लड़ियों से हॉल सजाया गया था। हल्का संगीत माहौल रंगीन बना रहा था। लड़कियाँ और लड़के मिलजुल कर बातें कर रहे थे। रोहित के साथ देवयानी को आते देख, एक सीनियर ने रिमार्क कसा-

‘‘लो दोस्तो, प्रिंस चार्मिंग अपनी सिंड्रेला के याथ आ रहे हैं।‘‘

सबकी हँसी पर देवयानी अपने में सिमट आई। देवयानी के उस संकोच पर रोहित हँस पड़ा-

‘‘कम ऑन, देवयानी। ऐसी बातों की तो आदत डालनी होगी। वैसे तुम्हारे मुकाबले सिंड्रेला की क्या औकात, हाँ, तुम्हें परियों की राजकुमारी कहा जाना चाहिए।‘‘ मंद स्मित के साथ रोहित ने कहा।

‘‘छिः। अब आप भी बनाने लगे।‘‘ शर्म से देवयानी के गोरे गाल लाल हो गए।

‘‘अरे, आपको तो भगवान ने गढ़कर भेजा है, इंसान की क्या मज़ाल जो आपको बना सके।‘‘

‘‘कुछ देर पहले आपने मुझे ‘तुम‘ कहा था। प्लीज़ हमे तुम कहकर ही बात करें। आपसे छोटी हूँ।‘‘

‘‘मंज़ूर। पर तुम्हें भी एक शर्त माननी होगी।‘‘

‘‘कौन-सी शर्त।‘‘ बड़ी मासूमियत से देवयानी ने पूछा।

‘‘तुम भी मुझे रोहित जी नहीं, सिर्फ़ रोहित कहोगी। और हाँ, मैं भी तुम्हारे लिए ‘आप‘ नहीं बस ‘तुम‘ हूँ। दोस्ती में ये जी और आप जैसे शब्द बड़े फ़ॉर्मल से लगते हैं, देवयानी।

‘‘लेकिन आप तो हमसे उम्र और क्लास दोनों में बड़े हैं।‘‘

‘‘अमरीका में तो माँ-बाप, टीचर को भी नाम से पुकारा जाता है।‘‘

‘‘ये अमरीका तो नहीं।‘‘

‘‘देखो, या तो मेरी शर्त मंज़ूर करो या दोस्ती तोड़ दो।‘‘ रोहित की उत्सुक हष्टि देवयानी पर गड़ गई।

‘‘ये तो ठीक शर्त नहीं है, रोहित जी।‘‘

‘‘अगर मैं ग़लत हूँ, तो इतना जान लो, इस कॉलेज में फ़ॉर्मेलिटी नहीं, अपनापन मिलेगा। तुम अपनी माँ को अगर ‘आप‘ कहकर संबोधित करती हो तो उनसे निकटता महसूस नहीं करतीं।‘‘ रोहित ने अपना फ़ैसला सुना दिया।

निरूत्तर देवयानी का हाथ पकड़ रोहित ने कहा-

‘‘तुम्हारी चुप्पी तुम्हारी स्वीकृति है। हमारी दोस्ती हमेशा बनी रहे। चलो, अब प्रोग्राम शुरू होने जा रहा है।‘‘

लड़को ने लड़कियों को कुछ चिटें बाँटी। उन पर नम्बर लिखे थे। जिस नम्बर को पुकारा जाएगा, उस लड़की को स्टेज पर जाकर उससे जो फ़र्माइश की जाए, उसे पूरा करना होगा। देवयानी के हाथ में नं. 5 की चिट थी। अचानक नम्बर 5 की पुकार पर देवयानी को स्टेज पर जाना पड़ा। लड़कों ने आवाज़ लगाई-

‘‘एक प्यार से सराबोर ग़ज़ल गाइए, मोहतरमा‘‘ देवयानी की हिचक पर रोहित आगे बढ़ आया-

‘‘दोस्ती के नाम पर एक ग़ज़ल सुना दो, देवयानी।‘‘

देवयानी ने जैसे ही माइक थामा, हॉल तालियों से गूँज उठा। देवयानी ने अपनी फ़ेवरिट ग़ज़ल शुरू की -

‘‘दिल चीज़ क्या है, आप मेरी जान लीजिए, बस एक बार मेरा कहा, मान लीजिए…….‘‘ सुरीले गले से निकली ग़ज़ल में मानो उमराव जान साकार थी। ग़ज़ल समाप्त होने पर कुछ पलों के लिए आत्म- विस्मृत सन्नाटा छाया रहा। अचानक ज़ोरदार तालियों की गड़गड़ाहट ने जैसे सबकी तंद्रा भंग कर दी।

‘‘एक और, वन्स मोर‘‘ के शोर के बीच देवयानी मंच से नीचे उतर आई। सब देवयानी की ओर मुग्ध दृष्टि से ताक रहे थे। रोहित ने देवयानी को बधाई देते कहा-

‘‘तुम में और कितने गुण छिपे हैं, देवयानी ? जितना ही तुम्हें जान रहा हूँ, उतना ही विस्मित हो रहा हूँ।‘

उसी वक्त देवयानी को सर्वसम्मति से कालेज की ‘लंता मंगेशकर‘ का खि़ताब मिल गया।

कुछ ही देर में नृत्य के लिए संगीत शुरू हो गया। लड़कों ने लड़कियों को आमंत्रित कर डांस शुरू कर दिया। देवयानी हॉल के कोने में बैठी नृत्य करते जोड़ों को कौतुक से देख रही थी। एक-एक करके कई साथियों ने देवयानी को नृत्य के लिए आमंत्रित किया, पर देवयानी प्रस्ताव शालीनता से अस्वीकार करती गई-

‘‘क्षमा करें, मुझे नृत्य नहीं आता।‘‘

‘‘आइए न, हम सिखा देंगे, बशर्ते आप हमे संगीत सिखा दें।‘‘ मुस्कराते मोहनीश ने कहा।

‘‘अरे पाश्चात्य नृतय में होता ही क्या है, बस इधर-उधर पाँव रखते रहिए।‘‘ अनुराग ने समझाया।

‘‘मुझे दूसरों को नृत्य करते देखना अच्छा लगता है। प्लीज़ हमे एन्ज्वॉय करने दें।‘‘

‘‘ओ. के. ऐज़ यू विश।‘‘

अचानक पीछे से आए रोहित ने देवयानी को कंधे से पकड़ जबरन खड़ा कर लिया। रोहित के साथ करीब-करीब घिसटती-सी देवयानी डांस- फ़्लोर पर पहुँच गई।

‘‘हमे छोड़ दो, रोहित। प्लीज़, हमे डांस नहीं आता।‘‘ देवयानी रूँआसी-सी थी।

‘‘ऐ बेबी, ज़िंदगी का एक-एक पल एन्ज्वॉय करना सीखो। न जाने कब हमें ये खूबसूरत दुनिया छोड़कर चले जाना पड़े। नाउ लेट्स स्टार्ट लाइक दिस………।‘‘

रोहित की बातों मे न जाने क्या जादू-सा था, देवयानी के पाँव उसके साथ उठते गए।

साथियों ने तालियाँ बजाकर, आवाजें कसीं-

‘‘हियर-हियर। रोहित यार, मान गए।‘‘

‘‘अब तू मेडिसिन की पढ़ाई छोड़, डांस-टीचर बन जा।‘‘ रोहित के साथी जयंत ने सलाह दी। हँसी-खुशी को वो शाम बड़ी जल्दी बीत गई। अचानक कलाई-घड़ी पर नज़र पड़ते ही देवयानी चौंक गई। ग्यारह बजे रात तक वो पहली बार बाहर रही थी। माँ का चिंतित चेहरा याद हो आया।

‘‘अब हमें जाना है, माँ परेशान होंगी।‘‘ साथ बैठी रितु हंस पड़ी

‘‘अरे, घर में तो रोज़ ही रहती हो, एक दिन यहाँ भी एन्ज्वॉय कर लो।‘‘

‘‘नहीं, रितु, हमारी परिस्थिति सबसे अलग है। माँ परेशान होंगी। हम जा रहे हैं।‘‘

देवयानी को खड़ा होते देख, रोहित पास आ गया।

‘‘क्या बात है, देवयानी ?‘‘

‘‘हमे घर जाना है, रोहित।‘‘

‘‘इतनी जल्दी ?‘‘

‘‘इतनी जल्दी ?‘‘

‘‘हमारे लिए ग्यारह बजे रात का मतलब बहुत देर हो जाना है, रोहित।‘‘

‘‘ओह, समझा। चलो तुम्हें घर तक छोड़ आऊँ।‘‘

हॉल के बाहर आकर रोहित अपनी मोटरबाइक के पास देवयानी को ले गया।

‘‘मोटरबाइक में पहलेकभी बैठी हो ? डर तो नहीं लगेगा ?‘‘ रोहित के चेहरे पर कंसर्न था।

‘‘नहीं, पर तुमने तो कहा था लड़कियों को घर तक छोड़ने का इंतजाम है।‘‘

‘‘अरे, इससे अच्छा इंतज़ाम क्या होगा, देवयानी। मिनटों में घर पहुँच जाओगी।‘‘

‘‘हमे मोटरबाइक पर बैठते डर लगता है। हम कभी नहीं बैठे हैं। अगर कोई रिक्शा मिल जाए तो हम चले जाएँगे।‘‘

‘‘व्हाट रबिश। इतनी रात गए अकेले रिक्शे में जाना क्या सेफ़ होगा। वेल। डोंट बिहेव लाइक ए चाइल्ड। कम ऑन। मैं बाइक स्टार्ट करता हूँ। तुम मेरे पीछे बैठ जाना। डर लगे तो मुझे कसकर पकड़ लेना। यकीन रखो गिराऊँगा नहीं।

देवयानी की झिझक देख फिर कहा-

‘‘क्या करूँ, अभी मेरे पास कार तो है नहीं। चलो, जल्दी करो वर्ना और देर हो जाएगी।‘‘

विवश देवयानी को रोहित के पीछे बैठना पड़ा। मोटरबाइक के झटकों से डरकर उसका हाथ रोहित के कंधे को जकड़े हुए था। घर के सामने पहुँच, रोहित ने मोटरबाइक रोक कर, देवयानी को उतार कर कहा-

‘‘डरीं तो नहीं ? हाँ, माँ को बता देना तुम मेरे साथ आई हो। अगर डाँट पड़े तो कोई बात नहीं, पर झूठ बोलना ग़लत होगा।‘‘

‘‘थैंक्स रोहित। मुझे आज तक माँ से कभी झूठ बोलने की ज़रूरत नहीं पड़ी न पड़ेगी। हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं एक-दूसरे की बात खूब समझते हैं।‘‘

‘‘मुझे तुमसे यही उम्मीद थी, देवयानी। ओ.के.बाय। गुड नाइट।

किक मार, रोहित उड़ गया।

कल्याणी खिड़की से देख रही थी। अंदर पहुँचते ही देवयानी ने कहा-

‘सॉरी, माँ। प्रोग्राम इतना अच्छा था वक्त का पता ही नहीं लगा।

‘‘किसके साथ आई थी, देवयानी ?‘‘

‘‘वो हमारे सीनियर रोहित थे…….‘‘

‘‘देख, देवयानी, आगे से किसी लड़के के साथ मोटरबाइक पर आने की ज़रूरत नहीं है।‘‘ गंभीरता से कल्याणी ने कहा।

‘‘ठीक है, माँ।‘‘

दूसरे दिन सुबह देवयानी ने अपने पिछली रात के प्रोग्राम के बारे में बताते हुए उत्साह से माँ से कहा-

‘‘जानती हो, माँ। कल हमें क्या खि़ताब मिला ?‘‘

‘‘मै तो वहाँ थी नहीं, कैसे जानूंगी, देवयानी ?‘‘

‘‘माँ, कल हमें कॉलेज की ‘लता मंगेशकर‘ का खि़ताब मिला है। हमने उमराव जान की ग़ज़ल सुनाई थी। हम तो नहीं गाना चाहते थे, पर सबने इतनी रिक्वेस्ट की कि गाना ही पड़ा।‘‘

‘‘कोई बात नहीं, अपनी कला को छिपाना नहीं चाहिए। मुझे खुशी है, तेरी ग़ज़ल सबको पसंद आई।‘‘ मुस्करा कर कल्याणी ने देवयानी का उत्साह बढ़ाया।

‘‘तुम बहुत अच्छी हो, माँ। हम तो डर रहे थे, कहीं तुम नाराज़ न हो। हाँ, तुम्हारी गाँव की औरतों वाली प्रोजेक्ट की क्या प्रगति है ?‘‘

‘‘देख, देवयानी, जो बात छिपाने की ज़रूरत पड़े, उसके लिए मैं नाराज़ हो सकती हूँ। तूने कुछ ग़लत नहीं किया। कल गाँव के मुखिया से बात की है, उम्मीद है अब औरतें हमारे कामों में सहयोग देंगी।‘‘

‘‘ये अच्छी बात है, माँ। तुम्हारे लिए मैं बहुत खुश हूँ। तुमने अब जीने के लिए एक मक़सद पा लिया है।‘‘

‘‘मेरी ज़िदगी का सबसे बड़ा मक़सद तो तुझे डॉक्टर बनाना था। वो पूरा हो रहा है। कल्याणी हल्के से मुस्करा दी।

‘‘नहीं माँ, कोई भी इंसान किसी दूसरे के नाम पर अपना मक़सद पूरा नहीं कर सकता। तुम्हारा मक़सद अब उन शोषित स्त्रियों को आत्मनिर्भर बनाना है, जिन्होंने खुशी का उजाला कभी जाना ही नहीं है।‘‘

‘‘आफ़िस से प्रोजेक्ट स्वीकृत हो जाए तब जल्दी ही काम शुरू हो जाएगा।‘‘

‘‘ऑफ़िस वालों का क्या रूख़ है ?‘

‘‘मेरे बॉस को योजना बहुत पसंद आई है। उन्होंने रिकमेंड करके फ़ाइल ऊपर भेज दी है।‘‘

‘‘वाह ! तब तो बात बन गई, समझो।‘‘

‘‘मेरी चिन्ता छोड़, तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे, याद रख, तुझे अच्छे नम्बरों से पास होना है।‘‘

‘‘घबराओ नहीं, माँ तुम्हारी बेटी हूँ। तुम्हारा नाम रौशन करूँगी।‘‘

‘‘मुझे तुझ पर पूरा विश्वास है। काश् रोहन और रितु भी तेरी तरह मेहनत से पढ़ते तो आज वो भी किसी प्रोफ़ेशनल लाइन में होते। रोहन तो अभी तक बारहवीं भी पास नहीं कर पाया और रितु मेट्रिक पर ही अटकी है।‘‘

‘‘ओह, माँ! तुम आज भी उन लोगों के बारे में सोचती हो, जिन्होंने हमें कभी अपना माना ही नहीं। हमेशा हमारा अपमान किया। आज भी रागिनी ताई की चेतावनी याद है, जब उन्होंने कहा था रितु के स्कूल में किसी को न बताना कि हम रितु के रिश्तेदार हैं।‘‘ देवयानी का मुँह उदास हो आया।

‘‘जाने दे, अगर उन्होंने ग़लती की तो हम भी उन जैसी ग़लती क्यों करें? आज तेरी सफलता से पापा जी ज़रूर खुश होते होंगे।‘‘

‘‘अच्छा माँ, चलती हूँ। कॉलेज के लिए देर हो रही है।‘‘

कॉलेज पहुँचते ही रोहित से सामना हो गया। वो सीनियर डॉक्टर के साथ राउंड ख़त्म करके आया था।

‘‘हलो। कल रात माँ ने डाँटा तो नहीं ?‘‘

‘‘नहीं, पर कहा है, आगे से हम किसी के साथ मोटरबाइक पर न बैठें।‘‘

‘‘उन्हें पता नहीं रोहित किसी ऐरे-गैरे की श्रेणी में नहीं आता। एक साल बाद एक ज़िम्मेदार डॉक्टर बन जाऊँगा।‘‘ कालर ऊँचा कर, रोहित ने गर्व से कहा।

‘‘क्या डॉक्टर बन जाने से कुछ ख़ास बन जाते हैं, रोहित ? हम तो चाहते हैं एक आम इंसान की तरह रहते हुए अपना काम करें।‘‘

‘‘ओह गॉड। तुम सचमुच सबसे बहुत अलग हो, देवयानी। बाई दि वे, आपके जीवन का उद्देश्य क्या है ?‘‘ हल्के से मुस्कराते रोहित ने पूछा।

‘‘हम अपने पापा के गाँव में काम करेंगे, रोहित। उस गाँव में पापा एक अस्पताल खोलना चाहते थे।‘‘ देवयानी के चेहरे पर उदासी की छाया घिर आई।

‘‘अच्छा, क्या तुम्हारे अस्पताल में मुझे भी काम मिल सकेगा ?‘‘

‘‘तुम्हारे पापा का शहर में इतना बड़ा नर्सिंग-होम है। तुम्हें तो उनके काम में मदद देनी होगी।‘‘

‘‘ये तो वक्त ही बताएगा, मै क्या करूँगा। अच्छा, अब चलता हूँ। कल फिर मिलेंगे।‘‘

कल्याणी के कार्यालय में उसकी योजना स्वीकृत हो गई। कल्याणी योजना का प्रथम चरण जल्दी शुरू करना चाहती थी। महिमा जी और देवयानी की सलाह थी, पहले चरण में औरतों को साक्षर बनाने के साथ कुछ घरेलू बुनियादी कामों को शुरू किया जाए। गाँव की औरतें चटाई-मूढ़े बनाती हैं, कशीदाकारी का हुनर भी शरबती, ज़मीला जैसी कई स्त्रियों के पास है। इन कामों के साथ लिफ़ाफ़े बनाना, टोकरी बुनना जैसे कामों को जोड़ा जा सकता है।

‘‘माँ, हमारे पास एक कशीदाकारी वाला बेड-कवर है, अगर गाँव की स्त्रियाँ वैसे बेड-कवर, तकिया गिलाफ़, मेजपोश बना सकें तो शहरों में ऐसे सामान की खूब माँग होगी।‘‘ देवयानी का चेहरा चमक रहा था।

‘‘हाँ, कल्याणी । देवयानी ठीक कह रही है अब शहरों में ही क्यों विदेशों में भी हाथ की बनी कलात्मक वस्तुओं की बहुत माँग है। मै तो कहती हूँ, साड़ियों और सलवार-सूट का भी काम शुरू कराना चाहिए।‘‘

‘‘हाँ, माँ। एक सलवार-सूट पर मेरे लिए भी बेल-बूटे कढ़वा देना।‘‘ देवयानी उत्साहित थी।

‘‘घबरा मत, तेरी शादी के लिए तेरी माँ साड़ी पर भी कशीदाकारी करवा देगी। क्यों कल्याणी ठीक कहा न ? महिमा जी ने परिहास किया।

‘‘छिः मौसी। अब तुम भी मज़ाक करने लगीं। हमें नहीं करनी है, शादी।‘‘ देवयानी तुनक गई।

‘‘अच्छा भई, मत करना शादी। चल मौसी को एक कप बढ़िया चाय तो पिला।‘‘

‘‘अभी लाई, मौसी।‘‘

कल्याणी और महिमा जी उदघाटन समारोह की योजना बनाने लगीं। दोनों समारोह को एक ख़ास कार्यक्रम बनाना चाहती थीं।

दो कप चाय के साथ देवयानी आ पहुँची। माँ और मौसी की बातें ध्यान से सुनती देवयानी को अचानक एक बात याद हो आई।

‘‘माँ, मेरे दिमाग़ में एक और सुझाव है। इस काम की चाभी तुम्हारे पास है।

‘‘मेरे पास कौन-सी चाभी है, देवयानी ?‘‘ कल्याणी सोच में पड़ गई।

‘‘अपना बक्सा कभी खोला है, माँ ?‘‘ देवयानी मुस्करा रही थी।

‘‘मेरे बक्से में क्या ख़ास है, देवयानी ? हमेशा ही खुला पड़ा रहता है।‘‘

‘‘मैं उस बक्से की बात कर रही हूँ, जिसमें तुम्हारे बनाए चित्र रखे हैं, माँ। शायद तुम नहीं जानतीं आजकल मघुबनी पेंटिंग्स कितनी डिमाँड में हैं। तुम औरतों को अपनी ये कला सिखाकर कई आधुनिक चीज़े बनवा सकती हो।‘‘

‘‘सच, कल्याणी। तुम्हारी इस कला के बारे में तो मुझे पता ही नहीं था। पंद्रह दिन पहले एक प्रदर्शनी में साड़ियों, टाई, स्कार्फ़ो पर मधुबनी शैली के चित्र बने थे। चे चीज़े हाथो-हाथ बिक गई।‘‘ महिमा जी ताज़्जुब में थी।

‘‘अगर ये संभव है तो मैं गाँव की औरतों को चित्र बनाने की कला ज़रूर सिखाऊँगी। घरेलू औरतें तीज-त्योहारों पर दीवारों और आँगन या दरवाज़ों पर अल्पना बनाती ही हैं। उन्के इस शौक को बस व्यावसायिक रंग देना होगा।‘‘ कल्याणी के चेहरे पर आत्मविश्वास था।

देवयानी के कॉलेज में इंटर- कालेज नृत्य प्रतियोगिता आयोजित की जानी थी। एक दिन बातों-बातों में देवयानी ने अपने साथ की लड़की नीता से कह दिया था, उसे नृत्य की शिक्षा नहीं मिली है, पर उसकी नृत्य में बहुत रूचि है।

‘‘अगर तुने क्लासिकल डांस सीखा होता तो क्या स्टेज परफ़ारर्मेंस दे सकती थी, देवयानी ?‘‘

‘‘पता नहीं, पर कभी-कभी जी चाहता है, मै भी नृत्य-कला में प्रवीण होती।‘‘

‘‘अगर तुझे नृत्य-कला का इतना ही शौक़ है, तब तो फ़िल्मी गानों पर ज़रूर नाचती होगी?‘‘

‘‘नहीं, हमे लोक-गीतों पर नृत्य करना अच्छा लगता है। बचपन में गाँव में हम सब लड़कियाँ मिलकर त्योहारों पर खूब नाचते थे।‘‘ बचपन की मीठी याद की खुशी से देवयानी का चेहरा जगमगा उठा। कॉलेज के नोटिस-बोर्ड पर नृत्य-प्रतियोगिता के लिए देवयानी का नाम लिखा देख, रोहित चौंक गया।

‘‘वाह ! मुझे तो पता ही नहीं था, संगीत के साथ-साथ तुम नृत्य-कला में भी एक्सपर्ट हो।‘‘

‘‘क्या….आ ? तुमसे ये किसने कहा ?‘‘ देवयानी ताज़्जुब में आ गईं।

‘‘अरे पूरा कॉलेज जान गया है। अपना नाम नोटिस-बोर्ड पर नहीं देखा ?‘‘

नोटिस-बोर्ड पर अपना नाम देख, देवयानी चौंक गई। ऑर्गनाइज़र ने देवयानी का नाम हटाने से साफ़ इंकार कर दिया। उसका नाम दूसरे कॉलेजों तक भेजा जा चुका था। बात अब कॉलेज के प्रेस्टिज की थी। दूसरी कोई लड़की लोक-नृत्य के लिए प्रस्तुत नहीं थी। आशा नाम की लड़की कत्थक नृत्य के लिए और सीता भरत-नाट्यम नृत्य-प्रतियोगिता में भाग ले रही थीं।

देवयानी समझ गई ये नीता की चाल है। नीता से जब पूछा तो उसने सहास्य जवाब दे डाला-

‘‘देख, देवयानी, तेरी बातों से मैं जान गई तुझमें एक नृत्यांगना छिपी हुई है। एक बात समझ ले, गाँव की सोंधी माटी वाले गीतों पर तेरे पाँव उसी तरह थिरक उठेंगे जैसे कभी बचपन में थिरकते थे‘‘

‘‘नहीं, नीता। हमें अपनी हँसी नहीं उड़वानी है। गीत गाना दूसरी बात है, पर स्टेज पर नृत्य करना एकदम अलग बात है। हमसे नहीं होगा।‘‘

‘‘होगा, ज़रूर होगा, बस एक बार ठान ले तो तू क्या नहीं कर सकती, देवयानी।‘‘

‘‘घर में नाच-गा लेना चलता है, पर हज़ारों की भीड़ में स्टेज़ पर जाना संभव नहीं होगा। माँ सुनेगी तो नाराज़ होगी, नीता।‘‘

‘‘माँ को मनाने और तेरे रिहर्सल की ज़िम्मेदारी मेरी है, देवयानी।‘‘

दूसरे ही दिन नीता, कल्याणी से मिलने जा पहुँची। कल्याणी को मनाने में देर ज़रूर लगी, पर नीता के तर्कों के आगे, कल्याणी को हथियार डालने ही पड़े। नीता ने कॉलेज की कुछ लड़कियों को इकट्ठा कर लिया। देवयानी के गीतों को उन्हें स्वर देना था। कॉलेज की ऑकेस्ट्रा- टीम ने म्यूज़िक देना स्वीकार कर लिया।

एक बार फिर देवयानी का बचपन सजीव हो उठा। उत्साह के साथ वह लोक-नृत्य की तैयारी में जुट गई। कल्याणी भी बेटी को उत्साहित करती।

उसी व्यस्तता में कल्याणी की योजना का उदघाटन-दिवस आ पहुँचा। योजना का उदघाटन करने स्वयं ऑफ़िस के डाइरेक्टर आए थे। समारोह में महिमा जी, सुनीता, कुसुम से साथ देवयानी भी उपस्थित थी। गाँव की स्त्रियाँ कौतुक से तैयारी देख रही थीं। वे यह समझने में असमर्थ थीं कि उतना बड़ा आयोजन उनके लिए हो रहा था। चंदन और उसके नौजवान साथियों में ख़ासा उत्साह था। पुरूष-वर्ग के बीच ज़रूर फुसफुसाहट चल रही थी।

पारो और बन्तो के साथ गाँव की लड़कियों ने नृत्य प्रस्तुत कर समाँ बाँध दिया। नृत्य के बीच पारो, देवयानी को भी खींचकर ले गई। सचमुच लोक-संगीत की लय पर देवयानी के पाँव आसानी से थिरक उठे। नीता ठीक कहती थी, बचपन का नृत्य आज फिर साकार था।

स्त्रियों के सामने ‘उ‘ लिखकर कल्याणी ने समझाया, उसकी योजना स्त्रियों के ही नहीं उनके परिवार की ज़िंदगी में उजाला लाएगी। घूँघट की ओर से कुछ स्त्रियाँ मुस्कराईं और लड़कियों ने उतावली में ‘उ‘ लिखना शुरू कर दिया।

कल्याणी की योजना ने स्त्रियों की आँखों में सपने जगा दिए। उनकी समझ में आ गया आत्मनिर्भर बनकर ही वे सुखी हो सकती हैं। शुरू-शुरू में पढ़ने के नाम पर औरतों को संकोच होता, पर धीरे-धीरे वे खुलने लगीं। उन्हे पढ़ाने के लिए जया और नमिता नाम की दो हँसमुख लड़कियाँ आने लगीं।

जिस दिन पहली बार उन्होनें अपना नाम लिखा, उनकी खुशी देखते बनती थी। स्लेट पर सिर झुकाए पारो को लिखता देख, बन्तो ने छेड़ा-

‘‘अरे ये क्या, पारो ने अपने नाम की जगह चंदन का नाम लिख दिया।‘‘

‘‘चल, झूठी कहीं की। हमने तो अपना ही नाम लिखा है, दीदी। हमें बंतो से बात नहीं करनी है।‘‘ पारो ने झूठा गुस्सा दिखाया।

‘‘ओय होय। मन-मन भावे मुडिया हिलावे। सच कह, तेरे मन में बस चंदन का ही नाम बसता है या नहीं ?‘‘ पारो हंस रही थी।

‘‘हाँ-हाँ, बसता है,तेरा क्या जाता है ? तू भी तो मनोहर पर मरती है।‘‘

औरतें हँस पड़ीं। कल्याणी का ये केंद्र सिर्फ़ काम सीखने-सिखाने का ही केंद्र नहीं था बल्कि स्त्रियों के लिए वह मनोरंजन की भी जगह थी। हँसी-ठिठोली करतीं स्त्रियों को काम करना सहज लगता। कपड़ो पर फूल काढ़ते, उनके सपने खिलते जाते। उनके बनाए कलात्मक सामान को देख, लोग आश्चर्य करते। पारो और चंदन की शादी तय हो गई थी। पारो अपने लिए एक साड़ी पर कशीदाकारी कर रही थी। खुशी में समय बीतता जा रहा था।

देवयानी के कॉलेज में नृत्य-संध्या की तिथि आ पहुँची। कल्याणी ने देवयानी के लिए हल्के गुलाबी रंग का लहंगा-चुन्नी तैयार किया था। लहंगे-चोली और चुन्नी पर सुनहरे बूटे चमक रहे थे।

मंच पर गाँव का दृश्य बनाया गया था। कुएँ के पास पनिहारिन बनी देवयानी अपूर्व लग रही थी। धड़कते दिल से गीत के बोलों पर देवयानी ने नृत्य प्रस्तुत किया। नृत्य की समाप्ति पर एक क्षण के सन्नाटे के बाद हॉल तालियों से गूँज उठा। सपने से जगाए गए से लोग विस्मय-विमुग्ध थे।

प्रतियोगिता के निर्णय की घड़ी आ गई। कत्थक नृत्य में कॉलेज की आशा को तीसरा स्थान मिला, सीता किसी भी पुरस्कार से वंचित रही। देवयानी के प्रथम पुरस्कार की घोषणा का दर्शकों ने ज़ोरदार तालियों से स्वागत किया। नीता ने देवयानी को गले से लगा लिया-

‘‘तूने आज कॉलेज का सम्मान बढ़ाया और मेरे विश्वास की रक्षा की है, देवयानी। अब किसी भी चीज़ को असंभव मत समझना।‘‘

‘‘थैंक्स, नीता। तूने मुझे नई हिम्मत और ताक़त दी है। तेरी बात हमेशा याद रखूँगी।

पुरस्कार ग्रहण कर मंच से उतरती देवयानी को रोहित ने रोक लिया-

‘‘कांग्रेच्युलेशन्स। अब और कितने सरप्राइज़ेज़ दोगी, देवयानी। जितना ही तुम्हें जानता हूँ, मुग्ध होता हूँ।‘‘

‘‘शुक्रिया। वैसे हम इतनी तारीफ़ के लायक नहीं है, रोहित। हमें तो ये पता भी नहीं था हम स्टेज पर डांस कर सकते हैं।‘‘ शर्माती देवयानी ने कहा।

‘‘आज की तुम्हारी इस सफलता के लिए मेरी ओर से ट्रीट तय रही। बोलो कहाँ चलना है।‘‘

‘‘कहीं नहीं, माँ घर में इंतज़ार कर रही होंगी।‘‘

‘‘ओह, मैं तो भूल ही गया। वो भी तो कम्पटीशन के रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रही होंगी। चलो, मैं ड्राप कर देता हूँ।‘‘

‘‘नहीं, तुम्हारी मोटरबाइक से कही भी न जाने का माँ से वादा किया है। सॉरी, रोहित।‘‘

‘‘अजी आज हम देवयानी दि ग्रेट के लिए बाइक नहीं कार लाए हैं। अब तो चलें?‘‘

सकुचाती देवयानी, रोहित के साथ आगे की सीट पर बैठ गई। घर पहुँची देवयानी के साथ रोहित भी उतर आया। देवयानी के विस्मय पर हँसते रोहित ने कहा-

‘‘आज तो माँ जी से मिलकर ही वापस जाऊँगा। इजाज़त है ?‘‘

‘‘अपने आप निर्णय ले लिया फिर इजाज़त का सवाल ही कहाँ उठता है ?‘‘

दरवाज़ा खोलती कल्याणी देवयानी के साथ खड़े रोहित को देखकर ताज़्जुब में पड़ गई। कल्याणी का संशय खुद अपना परिचय देकर रोहित ने दूर कर दिया।

‘‘माँ जी, रोहित। फ़ाइनल इअर कम्प्लीट कर रहा हूँ। देवयानी के गुणों का प्रशंसक हूँ। सोचा इतनी गुणवान लड़की की माँ से मिलना ज़रूरी है।‘‘

‘‘अच्छा-अच्छा। आओ।‘‘

‘‘माँ, मुझे लोक-नृत्य में फ़र्स्ट प्राइज़ मिली है।‘‘ खुशी से उमगती देवयानी ने माँ को बताया।

‘‘चल, तेरी मेहनत सफल हुई।‘‘

‘‘बस, क्या इतना कहना ही काफ़ी है ? मैं तो मिठाई खाए बिना टलने वाला नहीं हूँ, माँजी।‘‘

‘‘ज़रूर, लेकिन आज तो बस घर का हलवा ही मिल सकेगा। पहले से पता होता तो मिठाई मँगाकर रखती।‘‘ कुछ संकोच से कल्याणी ने कहा।

‘‘अरे वाह ! मज़ा आ गया। घर के हलवे के सामने बाज़ार की मिठाई कौन पसंद करेगा। जब तक मम्मी थीं, हर मंगल को हलवा बनाती थीं।‘‘ रोहित उदास था।

‘‘तुम्हारी मम्मी को क्या हुआ रोहित ?‘‘

‘‘दो दिन की बीमारी में माँ ये दुनिया छोड़ गईं। पापा भी कुछ नहीं कर सके।‘‘

‘‘हाँ, बेटा। ऊपर वाले के सामने किसी की नहीं चलती। देवयानी के पापा की क्या जाने की उम्र थी ?‘‘ कल्याणी ने लंबी साँस ली।

‘‘होनी को कोई नहीं टाल सकता, पर देखिए, देवयानी की वजह से माँ के रूप में आप मिल गईं। मैं आपको माँ कह सकता हूँ ?‘‘

‘‘क्यों नहीं, रोहित। जब जी चाहे हलवा खाने आ जाना।‘‘ कल्याणी हल्के से मुस्करा दी।

‘‘ये हुई न बात। देवयानी तुम बस बातें ही सुनती रहोगी या मेरा हलवा भी लाओगी।‘‘

हँसी-खुशी में वो शाम बीत गई। उस दिन के बाद से रोहित अक्सर देवयानी के साथ घर आ जाता। रोहित के आने से घर जैसे चहक उठता। कल्याणी की इजाज़त ले, रोहित कभी-कभी देवयानी को किसी रेस्ट्र या पार्क जैसी जगहों में भी ले जाता। न जाने क्यों देवयानी को रोहित के साथ देख, कल्याणी के मन में रोहित के लिए बहुत प्यार और ममता उमड़ आती।

दिन-महीने-साल, बीतते देर नहीं लगती। दो वर्षों में कल्याणी का केंद्र एक खुशहाल केंद्र बन चुका था। गाँव की औरतों का हुनर उनके बनाए सामान में चमकता। गाँव के प्रधान और ब्लॉक डेवलपमेंट अधिकारी भी प्रसन्न थे। उनकी मदद से औरतों का बनाया सामान शहर के बिक्री केंद्रों में जाने लगा। पहली बार जब औरतों के हाथों में पैसे आए तो सब खुशी में जी भर कर नाचीं। ज़मीला चाची ने चेतावनी दे डाली-

‘‘याद रखो, ये हमारी मेहनत की कमाई है। इससे हम अपने बच्चों को पढ़ाएँगें, उन्हें अच्छा खाना खिलाएँगें। ये पैसा मरदों की दारू के लिए नहीं देना है।‘‘

‘‘हाँ, चाची। इतना ही नहीं, हम शराबी पति के लिए दरवाज़े नहीं खोलेंगे।‘‘ शरबती ने ज़ोरदार आवाज़ में घोषणा कर डाली।

‘‘आज तुम सच्चे अर्थों में साक्षर बनी हो। बस इसी तरह तुम्हें आगे बढ़ते जाना है।‘‘ कल्याणी ने हौंसला बढ़ाया।

‘‘हां दीदी, हम आपके साथ आगे ही बढ़ते जाएँगे, ‘‘ बंतो ने खुशी से कहा।

‘‘तुम सबके लिए एक और खुशख़बरी है। अगले महीने तुम्हारे लिए हथकरधा आ रहा है। तुम्हें हथकरधे पर कपड़ा बुनना सिखाया जाएगा।‘‘

‘‘जुग-जुग जीओ बेटी। तुमने तो हमारे सपने सच कर दिए।‘‘ बूढ़ी काकी ने कल्याणी को सच्चे मन से आशीर्वाद दिया।

देवयानी मेडिसिन के तीसरे वर्ष की पढ़ाई पूरी कर रही थी। माँ की विजय-गाथा उसे विस्मित करती।

‘‘माँ, तुम गाँव की औरतों की प्रेरणा हो। उनका जीवन तुमने बदल दिया, पर अपने लिए क्या कर रही हो ?‘‘

‘‘क्या मतलब है, तेरा ?‘‘

‘‘यही कि तुम समाज-कल्याण में एम.ए. क्यों नहीं कर लेतीं। सबके विकास के साथ तुम्हें अपना भी विकास करना चाहिए, तभी पापा की आत्मा को संतोष मिलेगा।‘‘ दृढ़ स्वर में देवयानी ने कहा।

‘‘तू ठीक कहती है, मैं आज ही से पढ़ाई शुरू करूँगी। तेरी मेडिसिन की पढ़ाई पूरी होगी और मैं भी एम..ए कर लूँगी।‘‘

‘‘चलो अब घर में दो-दो विधार्थी हो गए।‘‘ प्यार से देवयानी ने माँ के गले में हाथ डाल दिए।

दूसरे दिन देवयानी को अपनी प्रोन्नति का आर्डर मिला। उसे वरिष्ठ समाज कल्याण अधिकारी बनाया गया था। डाइरेक्टर ने सबके सामने कल्याणी की प्रशंसा करते हुए कहा-

‘‘हमारे समाज को कल्याणी जैसी कर्मठ स्त्रियाँ चाहिए। कल्याणी ने तो गाँव की स्त्रियों तक उजाला पहुँचाया है। मैं कल्याणी के उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ।‘‘

उस दिन रोहित देवयानी के साथ कल्याणी को भी जबरन रेस्ट्रा लेगया। वर्षो बाद कल्याणी ने बाहर की जगमगाहट देखी थी। उसके संकोच पर रोहित हँस पड़ा-

‘‘अपने को पहचानिए, माँ। आज आप भले ही लोगों से अपरिचित हैं, पर जल्द ही लोग आपको एक समाज-सेविका के रूप में सम्मान देंगे। उस दिन आपको ट्रीट देनी होगी।‘‘ रोहित की आवाज़ में विश्वास था।

देवयानी और कल्याणी अपनी-अपनी पढ़ाई में जुट गईं। कार्यालय, घर के दायित्वों के साथ कल्याणी गाँव की औरतों के प्रति पूरी तरह सजग थी। हथकरधा- केंद्र चालू हो गया था। पारो अपने चंदन के लिए एक दोशाला बुन रही थी। पाँच दिन बाद पारो की शादी थी, उसके पहले उसे दोशाला पूरा कर लेना था।

पारो और चंदन की शादी में खूब धूम-धड़ाका रहा। बंतो और उसकी सहेलियों ने पूरी रात नाच-गाकर खूशी मनाई। चंदन के जूते बंतो ने चुराकर अच्छी रकम वसूल की। कल्याणी और देवयानी के साथ रोहित भी शादी में शामिल होने आया था। बंतो ने देवयानी को छेड़ा-

‘‘ऐ दीदी, तुम्हारे साथ तुम्हारा दूल्हा आया है, क्या ? एकदम राजकुमार-सा लगे है।‘‘

‘‘छिः, जोक मुंह में आया बक देती है माँ से तेरी शिकायत करनी होगी, बंतो।‘‘ देवयानी का चेहरा लाल हो आया। रोहित हल्के से मुस्करा दिया।

पारो की शादी की धूमधाम ख़त्म होने के बाद औरतें अपने काम में लग गईं। उनका केंद्र अब ‘‘चेतना‘‘ के नाम से जाना जाता था। कुछ पत्रकारों ने आकर जब ‘चेतना‘ केंद्र की प्रगति देखी तो अपने अख़बारों में कल्याणी की भूरि-भूरि प्रशंसा कर डाली। अख़बारों की ख़बर ज़िले और राज्य तक पहुँची। सर्व सम्मति से उस गाँव को सर्वश्रेष्ठ गाँव का पुरस्कार देने का निर्णय लिया गया।

पुरस्कार समारोह में कई पत्रकार, कलक्टर महोदय के साथ कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। कल्याणी को मंच के बीच में स्थान दिया गया था। ग्राम-प्रधान ने ईमानदारी से स्वीकार किया कि उसके गाँव की औरतों के विकास का श्रेय कल्याणी को जाता है। आज गाँव की सभी स्त्रियाँ साक्षर बन चुकी हैं। पत्रकारों ने जब कल्याणी से ‘चेतना‘ के भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछा तो उसने सच्चाई से जवाब दिया-

‘‘सरकार ने पंचायत में तैंतीस प्रतिशत स्थान स्त्रियों के लिए नियत किए हैं। मैं चाहती हूँ चेतना की स्त्रियाँ सच्चे अर्थों में पंच बनकर फैसले सुनाएँ। वे किसी को दबाव में काम न करें।’’

‘‘आपकी इच्छा पूरी होगी, दीदी। इस बार पारो और ज़मीला चाची पंचायत में जाएँगी, ये हमारा फैसला है।’’ शरबती ने पूरे विश्वास से कहा। औरतों ने तालियाँ बजाकर शरबती की बात का अनुमोदन किया।

‘‘मैं ये भी चाहती हूँ कि स्त्रियाँ अपना बैंक चालएँ। जिस दिन वे ऐसा कर सकेंगी, मैं समझूंगी, मेरा कार्य सफल हुआ।’’

तालियों की गड़गड़ाहट के साथ कल्याणी का अभिनंदन किया गया। दूसरे दिन समाचार पत्रों में कल्याणी के चित्र के साथ उसके कार्यों की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई थी।

समाचार पत्र पढते कमलकांत का सीना गर्व से फूल उठा। पत्नी को बुलाकर कहा-

‘‘जिस बहू का हमने तिरस्कार कर घर से निकाल दिया। आज उसकी वजह से हमारा खांदान गौरवान्वित है, सरस्वती।’’

पत्नी की कोई प्रतिक्रिया न देख, उन्होंने फिर कहा-

‘‘चलो, हम चलकर अपनी बहू ओर पोती को घर ले आएँ। अब तो देवयानी डॉक्टर बनने वाली होगी। हमारे परिवार का नाम और सम्मान हमारी पोती ने बढाया है।”

‘‘क्या वे हमारे साथ आएँगी ?’’

‘‘हम अगर कोशिश करेंगे तो वो क्यों नहीं आएँगी, सरस्वती। आखिर देवयानी हमारा खून है। हमारे अमर की निशानी है।’’

सास-ससुर को अचानक अपने घर आया देख, कल्याणी चौंक गई। उनके पाँव छू, आदर से बैठाया। कमलकांत ने बिना किसी भूमिका के कहा-

‘‘हम तुम दोनों को लेने आए हैं, बहू। अपने घर चलो।’’

‘‘हम अपने घर में ही हैं, पापा जी। आप किस घर में ले जाने की बात कर रहे हैं ?’’ शांत स्वर में कल्याणी ने कहा।

‘‘ये तुम्हारा घर नहीं है, बहू। किराए का घर अपना नहीं हो सकता। अमर का घर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।’’

‘‘नहीं, पापा जी। इस घर ने हमें वो सब कुछ दिया है, जो आपका बेटा हमे देना चाहता था। वैसे भी अमर का घर तो वो गाँव है, जहाँ देवयानी जाकर उनके अधूरे सपने पूरे करेगी। हमें क्षमा करें, पापाजी। हाँ हमारे इस छोटे से घर में आपका हमेशा स्वागत रहेगा।’’

‘‘देख लिया, तुमने ही इसे पढ़ने की इजाज़त दी। आज ये जो कुछ भी है, उसके लिए तुम्हारा एहसान मानने की जगह, उल्टे जवाब दे रही है। चलो, हम चलते हैं।’’ सरस्वती क्रुद्ध थी।

‘‘क्षमा करें, माँ। पापा जी और आप हमेशा हमारे पूज्य रहेंगे। पापा जी, आपने हमारी जो सहायता की उसके लिए मैं आपकी बहुत आभारी हूँ। अगर हम कभी आपके काम आ सकें तो प्रसन्नता होगी। बड़े विनम्र स्वर में कल्याणी ने अपनी बात कह दी।

‘‘रहने दो, भगवान न करें हमे कभी तुम्हारी ज़रूरत पड़े। तुम्हारी औकात ही क्या है ? चलिए जी, चलें। मै तो पहले ही यहाँ नहीं आना चाहती थी।’’ सरस्वती का आक्रोश शब्दों में फूट पड़ा।

‘‘चुप रहो, सरस्वती। इसी अभिमान की वजह से हमने बेटा खोया घर आई बहू और बेटी का निरादर किया। अब और एक शब्द भी मत कहना। हमे माफ़ करना, बहू। देवयानी को देखने की साध थी, उसे हमारा आशीर्वाद देना।’’ स्नेह विगलित कंठ से आशीर्वाद दे, कमलकांत चले गए।

कॉलेज से वापस लौटी देवयानी से कल्याणी ने सास-ससुर के आगमन की बात बताई। देवयानी को निर्णय लेने में देर नहीं लगी।

‘‘तुमने ठीक किया माँ। वो घर कभी हमारा था ही नहीं। एक-एक पल हमने अपमान के साथ जिया। हाँ, बाबा के मन में ज़रूर कभी हमारे लिए दया उमड़ती थी, पर घर के बाकी सदस्य हमें सिर्फ नफ़रत की नज़रों से देखते रहे। ऐसे खून के रिश्तों के मुकाबले, महिमा मौसी के साथ रिश्ते को मैं ज़्यादा बड़ा मानती हूँ। माँ।’’

‘‘ठीक कहती है, देवयानी। तूने मेरे मन का भार हल्का कर दिया। चल हाथ-मुँह धोकर कुछ खाले।”

‘‘तुम्हारी पढ़ाई का क्या हाल है, माँ ? जानती हो एक साल बाद मैं पूरी डाक्टर बन जाऊँगी। मेरे साथ तुम्हें भी एम.ए. कर लेना है।

‘‘घबरा नहीं, तुझसे पीछे नहीं रहूँगी।’’ सहास्य कल्याणी ने कहा।

रोहित मेडिसिन की पढ़ाई पूरी कर, डॉक्टर बन चुका था। न जाने क्यों पिता के नर्सिंग होम में काम करने की जगह, वह अपने ही मेडिकल कॉलेज में रेसीडेंस की तरह जॉब करने लगा। देवयानी पूछ बैठी-

‘‘क्या बात है, रोहित, अपने पापा की शानदार नर्सिंग होम छोड़कर तुम यहाँ जॉब कर रहे हो ? कहीं अपने पापा से लड़ाई तो नहीं कर डाली, देवयानी ने परिहास किया।

‘‘सच कहूँ, तो इस कॉलेज में मुझे जो अनमोल रत्न मिला है, उसे छोड़कर स्वर्ग जाना भी संभव नहीं है, देवयानी। वैसे मैं क्या लड़ाका इंसान लगता हूँ, जो अपने पापा से भिड़ जाऊँगा। रोहित हँस रहा था।

‘‘अरे, इस जगह तुम्हें कोई रत्न मिल गया। कमाल की बात है, कहाँ है वो रत्न ?’’ देवयानी हँस रही थी।

‘‘वो रत्न तुम हो, देवयानी। कभी सोचा नहीं था यहाँ तुम जैसा हीरा मिल सकेगा।’’

क्या ? मुझ जैसी मामूली लड़की को तुम हीरा कह रहे हो, रोहित ?’’

‘‘तुम नहीं जानतीं, तुम क्या हो, देवयानी। सच्चाई तो ये है, मैं तुम्हें बेहद प्यार करता हूँ। लगता है, तुमसे एक पल अलग रहना भी भारी पड़ेगा। बस इसीलिए यहाँ जॉब ले लिया है। आई लव यू, देवयानी।’’

‘‘नहीं, रोहित। ऐसा मत कहो, हमें डर लगता है।’’ देवयानी जैसे घबरा-सी गईं

‘‘किससे डरती हो, देवयानी ? मुझसे या मेरे प्यार से ? सच कहो, क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करतीं, देवयानी ?’’ रोहित की सवालिया निगाहें, देवयानी के चेहरे पर गड़ी थीं।

‘‘हमे कुछ नहीं पता, रोहित। प्लीज़ ऐसी बातें मत करो हमारी ज़िंदगी का मकसद प्यार या शादी नहीं है।’’

‘‘तुम्हारा मकसद ही मेरा मक़सद होगा। तुम्हारे रास्ते में कभी बाधा नहीं बनूँगा, ये मेरा वादा है।’’ रोहित गंभीर था।

‘‘ऐसा नहीं हो सकता। अपनी वजह से तुम्हारी ज़िंदगी बर्बाद नहीं कर सकते, रोहित। तुम शानो-शौकत की दुनिया में पले-बढ़े हो। मैंने कांटों का रास्ता तय किया है। उस रास्ते पर तुम नहीं चल सकोगे, रोहित।

‘‘आज़मा कर देखो, देवयानी। तुम्हारे साथ कांटे भी फूल बन जाएँगे।’’

‘‘ये बातें सच नहीं होती, रोहित। जिंदगी की कड़वाहट प्यार-व्यार भुला देती है।’’

‘‘कुछ भी कहो, मैंने तय कर लोया है, तुम्हारे सिवा किसी और लड़की से न शादी करूँगा न प्यार। तुम्हीं मेरी जिंदगी की पहली और आखिरी लड़की हो और हमेशा रहोगी। सोचकर जवाब देना, देवयानी।’’ देवयानी को कुछ कहने का मौका दिए बिना, रोहित तेज़ कदमों से चला गया।

घर आई देवयानी को सोच में डूबा देख, कल्याणी ने प्यार से वजह जाननी चाही। बिना कुछ छिपाए देवयानी ने रोहित के प्रस्ताव के बारे में सब कुछ बता दिया। कल्याणी को अपना अतीत याद हो आया। अमर के प्रस्ताव को भी वह आसानी से कहाँ स्वीकार कर पाई थी। आज कल्याणी को साफ़ नज़र आ रहा था, रोहित और अमर में कितना साम्य है। शायद इसी वजह से रोहित के साथ देवयानी को घूमने-फिरने की छूट उसने दे रखी थी। अमर की तरह ही रोहित, देवयानी से सच्चा प्यार करता है। बेटी के माथे पर आई लटें प्यार से सहलाती कल्याणी ने कहा-

‘‘सच्चा प्यार किस्मत से ही मिलता है, देवयानी। अगर इस प्यार को ठुकरा दिया जाए तो शायद ज़िंदगी भर पछताना पड़ सकता है।’’

‘‘नहीं, माँ अभी मैं शादी या किसी भी दूसरे बंधन के लिए तैयार नहीं हूँ। इंटर्नशिप खत्म करके मैं पापा के गाँव जाऊँगी। पापा का अधूरा सपना मुझे ही पूरा करना है। अब आगे कभी इस बारे में बात मत करना।’’

बेटी के दृढ़ चेहरे को देख, कल्याणी की और कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं हुई।

कल्याणी का एम.ए. का रिज़ल्ट और देवयानी की एम.बी.बी.एस. की डिग्री एक साथ ही मिलीं। कल्याणी ने एम.ए. परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी और देवयानी ने पूरे कॉलेज मे टॉप किया था। देवयानी के प्रोफ़ेसर डा0 राघव ने कहा था-

‘‘मै चाहता हूँ तुम रिसर्च-वर्क करके, कोई नई खोज करो। तुम जैसी जहीन लड़की साधारण डॉक्टर भर बनकर रह जाए, ये ठीक बात नहीं है।’’

‘‘थैंक्स, सर। मेरी जरूरत एक ऐसे गाँव में है, जहाँ बरसों से मेरा इंतज़ार किया जा रहा है। मुझे माफ करें, पर मैं वचनबद्ध हूँ।’’

घर पहुचने पर कल्याणी ने देवयानी को एक और खुशख़बरी दी। कल्याणी के कार्यालय में निर्देशक के रिक्त पद पर कल्याणी की नियुक्ति की गई थी। माँ का चमकंता चेहरा देख, देवयानी का मन संतोष से भर उठा-

‘‘ओह, माँ। आज तुमने पापा के सपने साकार कर दिए। अब तो जिंद़गी तुम्हारी मुट्ठी में है। मुझे तुम पर गर्व है, माँ।’’

‘‘गर्व तो मुझे भी अपनी बेटी पर है। मेरा सच्चा गौरव तो तू, मेरी बेटी देवयानी हैं’’

‘‘माँ, मैंने गाँव में चौधरी जी को चिट्ठी भेजी है। उन्हें लिखा है, मै गाँव पहुँच रही हूँ। हमारा घर ठीक करा दें।’’

‘‘तू क्या अकेली वहां रह सकेगी, देवयानी ? मैं भी तेरे साथ चलूँगी। मै यहाँ की नौकरी छोड़ दूँगी।’’

‘‘ना बाबा, ऐसा ग़जब मत करना। तुम्हारे चले जाने के बाद, तुम्हारे चेतना-केन्द्र का क्या होगा ? सुना है जल्दी ही गाँव में औरतें अपना बैंक खोलना चाह रही हैं।’’

‘‘हाँ, देवयानी। जब से पारो और ज़मीला चाची पंचायत में आई हैं, चेतना केंद्र’ दिन-ब-दिन तरक्की ही करता जा रहा है। पारो इस साल मेट्रिक की तैयारी कर रही है। चंदन की मदद से पारो अपने काम आसानी से पूरे कर लेती है।’’

‘‘चंदन बहुत समझदार युवक है। काश् गाँव के और पुरूष भी उसकी तरह समझदार होते।’’

‘‘वैसे गाँव के कई नौजवानों के सोच में बदलाव आया है। प्रधान जी का बेटा भी चेतना केंद्र की तरक्की में साथ दे रहा है।’’

‘‘ये तो अच्दी बात है, माँ। अब मुझे जाने की तैयारी करनी है।’’

‘‘समझ में नहीं आता, तेरे बिना कैसे जी सँकूगी?’’ कल्याणी उदास थी।

‘‘तुम अकेली कहाँ हो, माँ। यहाँ तो महिमा मौसी और चेतना का भरा-पुरा परिवार तुम्हारे साथ है। अकेले तो हम अपने बाबा के घर में थे।’’

‘‘उन बातों को भूल जा, देवयानी। गाँव में चौधरी काका की उम्र हो गई है, पर उनके साथ तेरे पापा को प्यार करने  वाले और लोग  तेरा ख़्याल रखेंगे, इसी बात का संतोष है।’’ कल्याणी ने गहरी साँस ली।

‘‘हाँ माँ, ठीक कह रही हो। चौधरी काका ही क्यों,  गाँव में पापा को प्यार करने वाले कम तो नहीं हैं। जो पापा को प्यार करते थे, वो क्या उनकी बेटी को प्यार करेगे। मेरी सहेलियाँ भी तो गाँव में होगी। रमा काकी, सुगना बुआ सब हमें कितना प्यार करती थीं।’’ देवयानी पुरानी मीठी यादों में खो गई।

‘‘अरें, अपने गोपाल भइया को भूल ही गई। तुझे पीठ पर बैठाकर, गाँव भर का चक्कर लगाता था।’’

‘‘उन्हें कैसे भूल सकती हूँ। पापा के सबसे बुद्धिमान छात्र थे। अब न जाने वो कहाँ होंगे।’’

‘‘हाँ, देवयानी। गाँव छोड़े अरसा हो गया। न जाने कौन कहाँ होगा।’’

‘‘घबराओं नहीं, माँ। मै नए रिश्ते जल्दी ही कायम कर सकती हूँ।’’

‘‘और पुराने रिश्तों को तोड़ भी आसानी से देती हो। क्यों ठीक कहा न, देवयानी।’’ खुले दरवाज़े से अंदर आए रोहित ने कटु स्वर में कहा।

‘‘अरे, रोहित, तुम कब आए ?’’

‘‘तब ही, जब तुम नए रिश्ते कायम कर रही थीं।’’

‘‘सॉरी, रोहित। मेरा वो मतलब नहीं था।’’

‘‘तुम्हारा जो भी मतलब हो, मैं समझना नहीं चाहता। बस इतना बता दो नए रिश्ते बनाने कब जा रही हो। कम से कम तुम्हें जाते वक्त अपनी शुभकामनाएँ तो दे सकूं।’’

” चौधरी काका की चिट्ठी आते ही ख़बर करूंगी, रोहित और प्लीज़ इतने कड़वे मत बनो। हम अच्छे दोस्त थे और हमेशा अच्छे दोस्त बने रहेंगे।’’

‘‘इस कृपा के लिए एक बार फिर शुक्रिया। अब चलता हूँ।’’

अरे, बेटा, जब आए हो तो खाना खाकर जाओ’’ कल्याणी जैसे सोते से जागी।

‘‘नहीं, माँ, भूख नहीं है।’’ रोहित तेज़ी से चला गया। कल्याणी उदास हो गई।

‘‘देख रही है, देवयानी,  तेरे जाने की बात सुनकर रोहित का मुँह कैसा सूख गया है। खिले-खिले चेहरे पर काली बदली छा गई है। तू शादी के बाद भी तो अपना काम कर सकती है?’’

‘‘ओह, माँ। फिर वही पुराना राग मत अलापो। जाते वक्त मेरा मूड तो मत ख़राब करो।’’

देवयानी गाँव जाने को तैयार थी। कल्याणी ने मंगल-तिलक लगाकर आशीर्वाद दिया। देवयानी के लाख मना करने के बावजूद रोहित उसे गाँव तक छोड़ने, अपनी कार ले आया था। रास्ते भर रोहित चुप बैठा, ड्राइव करता रहा। गाँव में प्रविष्ट होते ही देवयानी चहक उठी-

‘‘वो देखो रोहित, उस कुंएँ पर हम पापा के साथ पानी खींचकर, मुँह धोते थे। ये हैंड पंप पापा ने लगवाया था। इस खेत के गन्ने हम खुद उखाड़कर खाते थे। इस आम और सामने वाले अमरूद के फल तो हमने किसी और को खाने ही नहीं दिए।’’

बरसात की हरियाली चारों ओर बिखरी पड़ी थी। ठंडी-ठंडी हवा ने रोहित का मूड ठीक कर दिया। बच्चों-सी उत्साहित देवयानी की ओर देख, वह हल्के से मुस्करा दिया।

‘‘थैंक्स गॉड। तुम्हारे चेहरे पर हँसी तो आई।’’ देवयानी खुश थी।

अपने घर के सामने पहुँच देवयानी कुछ देर के लिए अपने को भूल-सी गई। जीवन के ग्यारह वर्ष उसने उसी घर में बिताए थे। आज भी दीवारों पर माँ के बनाए चित्र धूमिल होकर भी देवयानी की स्मृति में चमक रहे थे।

कार रूकते ही लाठी  टेकते चौधरी काका के साथ पूरा गाँव उमड़ पड़ा। चौधरी काका के पाँव छूती देवयानी की आंखें भर आईं। सुगना बुआ, रमा, काकी, देवयानी को सीने से लगा, रो पड़ीं।

‘‘एकदम अपनी माँ जैसा रूप पाया है। हमारी कल्याणी को क्यों नहीं लाई, बिटिया?’’ आँचल से आंसू पोंछती रमा काकी ने पूछा।

‘‘माँ ठीक हैं। जल्दी ही आप सबसे मिलने आएगी। बुआ शन्नो, बसंती कैसी हैं?’’

‘‘अरे उन सबकी शादी हो गई। अपने-अपने घरमें खुश हैं। तुझसे मिलने आ रही होंगी। जमना चाची ने सूचना दी।

‘‘तेरे साथ तेरा दूल्हा है, देवयानी ?’’ सुगना बुआ ने धीमे से पूछा।

बुआ के धीमे से पूछे गए सवाल ने देवयानी के कान तक लाल कर दिए और रोहित के चेहरे पर शैतान मुस्कान तैर गई।

‘‘नहीं, बुआ। ये हमारे सीनियर डॉक्टर रोहित हैं।’’ दोनों के लिए हर घर से खाना आया था। सब उन्हें अपना भोजन खिलाने की कोशिश कर रहे थे।

रोहित उनके आतिथ्य से अभिभूत था। देवयानी के लिए घर में सभी ज़रूरी सामान की व्यवस्था कर दी गर्ह थी। पिता की मेज़-कुर्सी की मरम्मत कराकर नया-सा कर दिया गया था।

‘‘अमर बेटे ने हमें जो राह दिखाई, हमने उस पर अमल करने की कोशिश की है, बेटी। अब गाँव में बिजली-पानी की कोई कमी नहीं है। स्कूल में एक तुम्हारी उम्र की मास्टरनी आई है। बहुत अच्छी लड़की है।’’ गदगद कंठ से चैधरी ने कहा।

‘‘ये तो बहुत अच्छी बात है, काका। मैं जल्दी ही स्कूल जाकर टीचर से मिलूँगी।’’

रोहित के वापस जाते वक्त देवयानी अचानक उदास हो आई। लगा, कोई अपना अभिन्न उसे अकेला छोड़कर जा रहा है।

‘‘तुम आते रहोगे न, रोहित ?’’

‘‘तुम कहो तो हमेशा के लिए तुम्हारे साथ ही रह जाऊँ।’’ मुस्कराते रोहित ने कहा।

फिर वही बात ठीक है जाओ, पर माँ की खोज-खबर लेते रहना, प्लीज़।’’

‘‘ये भी क्या कहने की बात है ? वो मेरी भी तो माँ हैं’’ गंभीर रोहित ने कहा।’’

‘‘सॉरी गलती हो गई।‘‘

देवयानी ने अपने को काम में पूरी तरह डुबो लिया। सुबह से देर रात तक वह रोगी देखती। घरों में जाकर औरतों को सफ़ाई की शिक्षा देती। सब देवयानी को आशीष देते न थकते। अचानक एक दिन देवयानी के सामने उसकी सहेली सुष्मिता आ खड़ी हुई। देवयानी खुशी से लगभग चीख़ उठी……

‘‘सुषी तू यहाँ ?’’

‘‘हाँ, देवयानी। मैं यहाँ स्कूल में टीचर हूं।’’

‘‘ठीक कहा जाता है, दुनिया बहुत छोटी है। मैं तो तुझे खो ही चुकी थी। एक बात बता, तू इस गाँव में क्यों आई ?’’देवयानी विस्मित थी।

‘‘लम्बी कहानी है, देवयानी। इतवार को स्कूल बन्द रहेगा। घर आ जाना, वहीं बैठकर बातें करेंगे। हाँ, खाना मेरे साथ ही खाना।’’

‘‘ज़रूर, सुषी। अब तो इतवार का इंतजार कर पाना मुश्किल होगा। तुझे देखकर कितनी खुशी हो रही है, बता नहीं सकती।’’

‘‘ठीक है, मैं चलती हूँ, तू अपना काम कर।’’

इतवार को जल्दी से नहा-धोकर देवयानी सुष्मिता के घर पहुँच गई। सुष्मिता का घर स्कूल कम्पाउण्ड में ही था। खपरैल के दो कमरों वाले घर को सुष्मिता ने सादगी से सजा रखा था। देवयानी को वो घर बहुत अच्छा लगा। घर के काम करने के लिए एक हँसमुख लड़की कमली को देख, देवयानी को पारो याद आ गई।

चाय पीती देवयानी ने अपना सवाल फिर दोहराया, सुष्मिता इस गाँव में क्यों आई। बड़ी गंभीरता से सुष्मिता ने अपनी बात कही-

‘‘मेरे पिता की इस गाँव में डॉक्टर की तरह पहली पोस्टिंग थी। उनके घर एक आदिवासी लड़की महुआ, खाना बनाने आती थी। महुआ के भोलेपन पर पिता रीझ गए और अपनी सीमा तोड़ दोनों एक हो गए।’’

बात कहती सुष्मिता चुप हो गई।

‘‘फिर क्या हुआ, सुषी ? क्या तेरे पिता ने महुआ से शादी कर ली ?’’

‘‘अगर ऐसा होता तो अपने पिता पर मैं गर्व करती, पर वह तो कायर निकले। महुआ ने जब उनसे अपने माँ बनने की बात बताई तो पिताजी रातों-रात गाँव छोड़कर शहर चले गए।’’

‘‘ओह ! फिर महुआ का क्या हुआ, सुषी ?’’

‘‘महुआ पिताजी के घर के सामने बैठी, उनका इंतज़ार करती रही। उसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। विक्षिप्तावस्था में ही उसने एक बेटी को जन्म दिया। एक दिन महुआ मृत पाई गई और उसकी बच्ची गायब थी।’’

‘‘ये तो बड़ी करूण कहानी है, सुषी। तुझे ये सब किसने बताया ?’’ देवयानी उदास थी।

‘‘पिताजी की मृत्यु के बाद उनकी डायरी मिली। वो भी अपने कृत्य पर शर्मिन्दा थे। तू तो जानती है मेरा कोई भाई नहीं, पिता के अन्याय का प्रायश्चित तो मुझे ही करना है। इस गाँव की लड़कियों में महुआ की बेटी और अपनी बहिन को खोजती हूँ , देवयानी।’’ सुष्मिता का कंठ भर आया।

‘‘तू डॉक्टर बनकर भी तो यही कर सकती थी, सुषी। तेरे पापा तो तुझे डॉक्टर बनाना चाहते थे, न ?’’

‘‘हाँ, देवयानी। पिताजी को दंड तो नहीं दे सकती थी, पर उनकी इच्छा पूरी न कर, एक तरह से उन्हें दंडित ही तो किया है, देवयानी।’’

देवयानी विस्मय से सुष्मिता के दृढ़ चेहरे को देखती रह गई। खाने का स्वाद ही जैसे बिगड़ गया। घर लौटकर देवयानी सोचती रह गई, कहाँ होगी, महुआ की बेटी। न जाने किसके हाथ वो नन्हीं बच्ची पड़ी होगी। अपने पिता पर देवयानी को गर्व हो आया, परिवार से निष्कासन सहकर भी उन्होंने माँ को अपनाया। सुष्मिता के प्रति उसके मन में अभिमान था, पिता की भूल का प्रायश्चित कर वह पुत्र का कर्तव्य निभा रही थी। अचानक एक दिन कल्याणी के साथ रोहित गाँव आ पहुँचा। कल्याणी से लिपट देवयानी रो पड़ी।

‘‘हे, ब्रेव गर्ल। ये आँसू कैसे ? माँ आई है’’ तो खुशी मनाओं।’’ रोहित ने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा तो देवयानी हँस पड़ी।

‘‘थैंक्स, रोहित। माँ को लाकर तुमने बहुत अच्छा काम किया हैं’’

‘‘तो मेरा इनाम मिलेगा?’’

‘‘क्या इनाम चाहिए?’’

‘‘पहले वादा करों, जो माँगू दोगी।’’

चलो, वादा किया, पर ऐसी चीज़ मत माँग बैठना जो दे न सकूं, ये गाँव हैख, समझे।’’

‘‘मंजूर। वही माँगूगा, जो तुम-सिर्फ तुम दे सकती हो।’’

‘‘ठीक है, माँगकर देखों, जरूरत मिलेगा।’’

‘‘मुढे स्वीकार कर लो, देवयानी। मै तुम्हारे बिना अधूरा हूं। तुम इस गाँव को अपनी कर्म-भूमि बनाए रखों, मुझे कोई ऐतराज नहीं है। जब समय मिलेगा, हम मिलते रहेंगे।’’

‘‘ये तो तुमने ऐसी चीज़ माँग ली, जिसे मै पहले ही अस्वीकार कर चुकी हूं।’’

‘‘अभी तुमने वादा किया है, जो चाहूंगा, मिलेगा। माँ साक्षी हैं, अब तुम वादा नहीं तोड़ सकतीं।’’

 ‘‘रोहित ठीक कह रहा है, देवयानी। मुझे खुशी है, तूने अपनी सेवा से गाँव वालों का दिल जीत लिया है। जिंदगी में और भी दायित्व पूरे करना तेरा फ़र्ज है। रोहित से अच्छा पति नहीं मिल सकेगा।’’

‘‘अच्छा ये तुम दोनों की मिली भगत है, इसीलिए रोहित तुम्हें यहां लाया है।’’

‘‘जी हां। एक बिगड़ी हुई लड़की को उसकी माँ ही सम्हाल सकती है। ठीक कहा न, माँ?‘‘

कल्याणी की मुस्कान पर देवयानी चिढ़ गई -

‘‘वाह, माँ। कुछ ही दिनों में बेटी को भुलाकर बेटे को अपना बना लिया।‘‘

‘‘अब ये तो बेटे के गुण पर निर्भर करता है। मै एक समझदार, सुलझा हुआ बेटा हूँ।‘‘

‘‘ठीक है, अपने मुंह मियां मिट्ठू। आत्मप्रशंसा से बड़ा दुर्गुण दूसरा नहीं, जानते हो, न?‘‘

‘‘चलो, तुम वादा तोड़कर तो हार ही गईं।‘‘

‘‘नहीं, रोहित। मेरी बेटी वादा कभी नहीं तोड़ सकती। ये गुण इसे अपने पिता से विरासत में मिला है। ठीक कहा न, देवयानी ?‘‘

‘‘माँ, तुम भी अब इमोशनली ब्लैकमेल कर रही हो। मुझे सोचने का वक्त चाहिए। हाँ, कल ज़िला-कलक्टर का गाँव का दौरा है, मुझे अपने स्वास्थ्य-केंद्र को ठीक करना है।‘‘

‘‘वाह ! इस काम में तो मैं भी तुम्हारी मदद कर सकता हूँ। चलें।‘‘

दूसरे दिन कलक्टर के रूप में जो युवक कार से उतरा, उसका चेहरा देवयानी को बहुत परिचित लगा। नाम सुनते ही देवयानी की स्मृति में गोपाल नाम का वह लड़का कौंध गया जिसकी पीठ पर बैठ, वह घंटों गाँव के चक्कर लगाती थी।

‘‘गोपाल भइया, आप गोपाल भइया हैं, न ? मेरी याद है, मैं देवयानी…… अमरकांत……जी की बेटी।‘‘

‘‘देवयानी……तू इतनी बड़ी हो गई। जब मुझे पता लगा गाँव में देवयानी नाम की डॉक्टर आई है, तब से मन में तुझसे मिलने की इच्छा थी।‘‘

‘‘पापा ठीक कहते थे, आखिर तुम कलक्टर बन ही गए।‘‘

‘‘ये सब उन्हीं का प्रताप है। बचपन से कुछ कर-गुज़रने की इच्छा उन्होंने ही पैदा की थी। माँ कैसी है, देवयानी ?‘‘

‘‘माँ अब एक शक्ति-संपन्न महिला बन गई हैं। आज वो यहाँ आई हुई हैं, मिलोगे ?‘‘

‘‘उनके चरण छुए बिना कैसे जा सकता हूँ। तुम्हारा स्वास्थ्य- केंद्र देखकर बहुत खुशी हुई। जो भी सामान चाहिए, मैं व्यवस्था करा दूँगा। तुम्हारी सहायता के लिए जल्दी ही दो नए डॉक्टर भी आने वाले हैं।‘‘

‘‘ये तो बड़ी अच्छी बात है। गाँव के स्कूल मे मेरी सहेली सुष्मिता टीचर है। उसकी भी मदद कर देना, भइया।‘‘

‘‘तुम सुष्मिता जी को जानती हो ? मै पहले से ही उनकी मदद करता आ रहा हूँ। तुमने देखा नहीं, स्कूल की इमारत और फ़र्नीचर कितना अच्छा है। जब तुम छोटी थीं तो टाट की दरी पर बच्चे बैठते थे।‘‘ गोपाल हँस पड़ा।

कल्याणी के पाँव छू गोपाल ने आशीर्वाद पा लिया। पुरानी यादों में काफ़ी रात हो गई। कल्याणी के अनुरोध पर गोपाल ने खाना भी खा लिया। रोहित का परिचय पाकर, गोपाल हल्के से मुस्करा दिया। देवयानी के कान में धीमे से कहा-

‘‘कांग्रेच्युलेशन्स। अच्छी पसंद है।‘‘ देवयानी फिर लाल पड़ गई।

कल्याणी और देवयानी से विदा लेते गोपाल ने कार स्कूल की ओर मोड़ दी। सुष्मिता उसे आया देख चौंक गई।

‘‘कहिए, स्कूल कैसा चल रहा है। सुना है शाम को खाली वक्त में आप औरतों को भी पढ़ाती हैं?‘‘ मुस्कराते गोपाल ने पूछा।

‘‘जी, वक्त तो काटना ही पड़ता है। अगर कुछ और सुविधाएँ मिल जातीं तो अच्छा होता।‘‘ कुछ संकोच से सुष्मिता ने कहा।

‘‘आप हुक्म कीजिए। सब कुछ आ जाएगा। आप जैसी टीचर का होना, गाँव वालों का सौभाग्य है।‘‘

‘‘शुक्रिया। यहाँ के लोगों से जो प्यार और अपनापन मिलता है, वो मेरी भी तो खुशकिस्मती है।‘‘

‘‘आप तो बहुत कुछ डिजर्व करती हैं, सुष्मिता जी। आज चलता हूँ, आता रहूँगा। यहाँ मेरी मुंहबोली बहिन देवयानी, आपकी सहेली है। आपका वक्त उसके साथ अच्छा बीतेगा। बॉय।‘‘

रोहित के साथ शहर लौटती कल्याणी ने देवयानी को अकेले में बहुत समझाया, अब वह सेटल हो चुकी है। स्वास्थ्य-केंद्र में भारी भीड़ के बीच भी देवयानी के चेहरे पर थकान का चिन्ह तक नहीं आता। अब उसे रोहित के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करना चहिए। रोहित को छोड़ना, सबसे बड़ी ग़लती होगी। कल्याणी की बातों में सच्चाई थी। अकेला जीवन काटने में उसके साथ उसकी बेटी देवयानी थी, पर देवयानी के सामने कौन है ?

माँ के चले जाने के बाद देवयानी सोच में पड़ गई। इतने दिनों में वह जान गई थी, रोहित ने उसके दिल पर अधिकार कर लिया था। वह मन ही मन उसे चाहने लगी थी। सुष्मिता के सामने जब उसने अपने मन की बात रखी तो उसने भी कल्याणी की ही बात का समर्थन किया। अगर रोहित को देवयानी के गाँव में रहने पर आपत्ति नहीं तो देवयानी के पास उसका प्रस्ताव ठुकराने का क्या कारण हो सकता है। बड़े संकोच से सुष्मिता ने बताया, गोपाल ने उसके सामने भी विवाह का प्रस्ताव रखा है। वह सुष्मिता से अक्सर मिलता रहा है। देवयानी खुशी से सुष्मिता से लिपट गई। अब वह उसे भाभी कहेगी।

सुष्मिता ने कल्याणी के पास देवयानी की रोहित के साथ विवाह की स्तीकृति भेज दी । ख़त पाते ही रोहित और कल्याणी आ पहुँचे। देवयानी ने गोपाल को भी फ़ोन करके बुला लिया। पूरी बात सुनते ही गोपाल ने एक शर्त रख दी-

‘‘अपनी बहिन की शादी के लिए मेरी एक शर्त है। देवयानी की बारात इसी गाँव में आएगी। ये गाँव देवयानी के पिता की कर्म-भूमि थी और अब देवयानी का भी कर्म-क्षेत्र है।‘‘

‘‘सौ बार मंजूर है, साले साहब। कहिए तो बारात चाँद तक ले जाऊँ।‘‘

‘‘एक शर्त मेरी भी है, गोपाल भइया को हमारी सुष्मिता से शादी करनी होगी।

ये शादी माँ के घर से होगी।‘‘ देवयानी ने मुस्कराते हुए गोपाल की मनचाही शर्त रख दी।

‘‘शर्त मंज़ूर की जाती है, पर पहले शादी बहिन की होनी चाहिए वर्ना ननद भाभी में झगड़ा होगा। ननद के ससुराल जाने के के बाद कोई ख़तरा नहीं रह जाएगा।‘‘ गोपाल के परिहास पर सब हँस पड़े।

गोपाल के साथ पूरा गाँव देवयानी की शादी की तैयारियों में जुट गया। सात-आठ दिन पहले से रात-रात भर नाच-गाकर, औरतों ने गाँव को गुलज़ार कर दिया। कल्याणी के अनुरोध पर देवयानी के बाबा-दादी और शशिकांत भी विवाह में सम्मिलित होने आ गए। देवयानी का सम्मान देख, उनका हृदय गर्व से फूल उठा। अमर की लोग पूजा करते थे। सरस्वती के मन का मैल दूर हो गया, देवयानी को सीने से लगाकर, वह रो पड़ीं। ये वही लड़की थी, जिसे एक ग्लास दूध को उन्होंने तरसाया था। बाबा-दादी का प्यार पाकर देवयानी की आँखों से भी गंगा-जमना बह निकलीं।

नियत दिन धूम-धड़ाके के साथ रोहित की बारात आई। मेडिकल कॉलेज के बहुत से साथी बारात में भाँगड़ा करते नाच रहे थे। नीता भी शादी में शामिल होने आई थी। गाँव वालों के आतिथ्य ने बारातियों को गदगद कर दिया। देवयानी और रोहित परिणय-सूत्र में बँध गए।

गाँव की परंपरानुरूप उनकी मधु-यामिनी गाँव में ही संपन्न होनी थी। सुष्मिता ने बेले और रजनीगंधा की लड़ियों से कमरा सजाया। गोपाल ने धीमे से पूछा-

‘‘हमारी सुहाग-रात में हमारा कमरा कौन सजाएगा ? अपनी पसंद बता दो, पहले से ही तैयारी करा लूँगा।‘‘

‘‘धत्त्। हम बात नहीं करेंगे।‘‘सुष्मिता लजा गई।

‘‘ज़िंदगी भर साथ रहना है, क्या मौन-व्रत रखोगी।‘‘ गोपाल हँसता हुआ चला गया।

सूर्योदय की चिड़ियों की चहचहाहट ने देवयानी और रोहित को जल्दी जगा दिया। दूर कहीं कोयल बोल रही थी। आम्र-मंजरियों से सुवासित हवा उन दोनों को छू गई। आँखें खोल रोहित ने देवयानी को अपने वाहुपाश में जकड़ना चाहा, पर देवयानी छिटक गई-

‘‘तुमने कभी गाँव की भोर देखी है, रोहित। यहाँ का सवेरा कोयल में बोलता है, सुन रहे हो ?‘‘

‘‘मैं तो बस अपनी देवयानी को देख सुन रहा हूँ। इधर मेरे पास आओ।‘‘

‘‘प्लीज़ रोहित, थोड़ी देर को इस खिड़की के पास आ जाओ। तुमने ऐसा सूर्योदय कभी नहीं देखा होगां‘‘

जबरन रोहित को बिस्तर छोड़, उठना पड़ा। पूरब से चमकता लाल सूरज उभरता आ रहा था। गाँव जैसे लाल-सुनहरे रंग में रंग गया था।

‘‘जानते हो राहित, जब मैं छोटी थी, सूरज को मुट्ठी में पकड़ने की ज़िद करती थी, तब पापा कहते थे, अगर अपनी शक्ति और अपने पर विश्वास रखो तो सूरज ज़रूर मुट्ठी में आ जाएगा।‘‘

‘‘पापा की उस बात का मबलब समझती हो, देवयानी। सच, उनका कहना कितना सार्थक था।‘‘

‘‘क्या मतलब था, रोहित ?‘‘ भोलेपन से देवयानी ने पूछा।

‘‘उनके कहने का मतलब यही था, अपने विश्वास और मेहनत से अपने लक्ष्य पा लेने का अर्थ, सूरज को मुट्ठी में कैद कर लेना ही तो होता है। आज उनकी देवयानी ने सचमुच सूरज को अपनी मुट्ठी में कैद कर लिया है।‘‘

‘‘तुम कितने अच्छे हो, रोहित। पापा की बात की व्याख्या कितनी अच्छी तरह की है। शायद मैं उनकी बेटी होकर भी उनकी बात नहीं समझ पाई।‘‘

‘‘अरे उनकी बेटी तो स्वयं चमकता सूरज है, जिसका उजाला दूर-दूर तक फैल रहा है।‘‘ प्यार से देवयानी की ठोढ़ी उठाकर रोहित ने कहा।

देवयानी ने शर्माकर रोहित के सीने में सिर छिपा लिया। उगते सूर्य की रश्मियाँ कमरे में अनुराग का रंग छिठका गईं।

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